सपने दोनों के हुए चूर – सुकमा में भाजपा की करारी हार! जेल में लखमा, फिर भी कांग्रेस का जलवा बरकरार – भाजपा की रणनीति बनी उपहास का विषय
*सुकमा जिला
संवाददाता जसराज जैन
21 मार्च 2025:*
सुकमा जिला पंचायत चुनाव के नतीजों ने भाजपा के तमाम दावों और रणनीतियों को ध्वस्त कर दिया है।
लगातार तारीखें बढ़वाकर सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की कोशिश में जुटी भाजपा, अंततः अपने ही जाल में उलझ गई।
जनता और सियासी गलियारों में अब एक ही चर्चा है – *”खोदा पहाड़, निकली चुहिया!”*
*खोखले दावों की करारी शिकस्त*
11 सदस्यीय जिला पंचायत में मात्र 3 सदस्यों के बल पर भाजपा ने सरकार बनाने का दावा किया था।
लेकिन नतीजों ने इन दावों की असलियत खोल दी।
जिनका दावा था कि सत्ता की चाबी उनके पास है, वही अब खुद हार के ताले में बंद हो चुके हैं।
*क्रॉस वोटिंग या रणनीति का छलावा?*
अध्यक्ष पद के चुनाव में विपक्षी गठबंधन के एक सदस्य ने क्रॉस वोटिंग कर दी।
सूत्रों के अनुसार यह वोट कांग्रेस से गया, जिससे अध्यक्ष पद की दौड़ में उम्मीद लगाए एक उम्मीदवार का सपना टूट गया।भाजपा ने इसे अपनी “रणनीतिक जीत” बताने की कोशिश की, लेकिन आंकड़े हकीकत को बयां कर रहे हैं – भाजपा को हूँगाराम मरकाम के पक्ष में केवल 5 वोट ही मिले।
अगर रणनीति इतनी मजबूत थी, तो बहुमत क्यों नहीं मिला?
*कहाँ चूक गई भाजपा?*
सुकमा में भाजपा की हार का ठीकरा अब संगठन के सिर फोड़ा जा रहा है।
जहाँ विधानसभा चुनाव में भी कोंटा सीट से पार्टी ने दूरी बना ली थी, वहीं त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भी हार की पुनरावृत्ति हुई।
ना जनता का भरोसा मिला, न ही अंदरूनी गुटबाज़ी पर नियंत्रण रखा जा सका।
*जेल में बंद लखमा का भी ‘लोकशक्ति’ पर असर*
तीन दशक से सुकमा की राजनीति के सिरमौर रहे कांग्रेस नेता *कवासी लखमा*, भले ही जेल में हैं, लेकिन उनका असर अब भी क्षेत्र की राजनीति पर साफ देखा गया।
भाजपा को फ्री हैंड नहीं मिला, और कांग्रेस समर्थित सरपंच, जनपद व जिला पंचायत सदस्य चुनावों में पूरी ताकत से उभरे।
*प्रशासनिक संकेतों का भी गलत अनुमान*
20 मार्च को हुए अध्यक्ष/उपाध्यक्ष चुनाव में भाजपा को प्रशासनिक स्तर से मिले ‘संकेतों’ को भी भांपने में संगठन चूक गया।
जब कांग्रेस प्रत्याशी निर्धारित समय से 7 मिनट देर से नामांकन दाखिल करने पहुंची, तो भाजपा को यह मौका मिल सकता था कि वे आपत्ति दर्ज कराकर अपना प्रत्याशी निर्विरोध बनवा लें।
लेकिन संगठन ने यह ‘गोल्डन चांस’ भी गंवा दिया।
*अंदरखाने की चर्चा है कि जिला स्तर पर पार्टी के निर्णयक नहीं, बल्कि भ्रमित चेहरे बैठे थे।*
*और अंत में… हार के बाद फिर वही पुराना खेल*
अब भाजपा हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय ‘क्रॉस वोटिंग’ को अपनी रणनीति बताकर खुद को सांत्वना दे रही है।
लेकिन जनता सब जानती है – *”ना तो लाल मिट्टी की आंधी रुकी, न ही कांग्रेस की पकड़ डगमगाई।”*
सवाल वही है – जब सब कुछ आपके पक्ष में था, तब भी जीत हाथ क्यों नहीं आई?
*सत्य यही है –*
*”कवासी लखमा भले जेल में हैं, पर भाजपा अब भी उनकी राजनीतिक पकड़ से आज़ाद नहीं हो सकी है।”
