*किरंदुल बाजार में आदिवासी सब्जी बेचने वालों की बेबसी: दिवाली की चमक में छिपा अंधेरा*
दंतेवाड़ा। दिवाली की रौनक पूरे देश में फैली हुई है। घर-घर दीये जल रहे हैं, बाजार रंग-बिरंगे सामानों से सजे हैं और लोग खुशियों में डूबे हुए हैं। लेकिन बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। वही किरंदुल बाजार, जो कभी आदिवासियों की पहचान माना जाता था, आज उन्हीं आदिवासी ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन गया है।
किरंदुल के मुख्य बाजार और मेन रोड पर एक तरफ सक्षम व्यापारियों ने दुकानें जमा रखी हैं। जगह-जगह पक्के स्टॉल और बड़े-बड़े ठेले लगे हैं। लेकिन दूसरी तरफ की तस्वीर विडंबना से भरी है। आसपास के गांवों से सब्जी और उपज लेकर आए गरीब आदिवासी ग्रामीणों को दो फीट जगह तक नहीं मिली। मजबूर होकर कुछ आदिवासी बस स्टैंड चौक के बीच बने फव्वारे के चबूतरे पर बैठकर ग्राहकों का इंतजार करते नजर आए।
टोकड़ी में थोड़ी-सी सब्जियां रखे ये आदिवासी घंटों इंतजार करते रहे। कोई ग्राहक नहीं आया। अंत में निराश होकर सामान वापस टोकरी में डालकर घर लौट गए। उनके चेहरे पर थकान और हताशा साफ झलक रही थी। एक तरफ जहां पूरा देश दिवाली की चकाचौंध में डूबा है, वहीं ये आदिवासी परिवार सोच रहे होंगे कि दिवाली उनके लिए भी कभी खुशियों का त्योहार बनेगी या हमेशा यूं ही निराशा लेकर जाएगी।
ये वही आदिवासी हैं जो जंगलों और खेतों से अपनी मेहनत की उपज लेकर बाजार आते हैं। थोड़ी सब्जी बेचकर घर के लिए नमक-तेल और बच्चों के लिए कुछ जरूरी सामान खरीदने की उम्मीद लेकर निकलते हैं। लेकिन बाजार में उन्हें बैठने तक की जगह नहीं दी जाती। स्थापित दुकानदारों के कब्जे में पूरा बाजार है। कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, कोई वैकल्पिक जगह नहीं, कोई सहानुभूति नहीं।
किरंदुल के आसपास के गांवों से आए इन बेबस आदिवासियों पर किसी की नजर ही नहीं पड़ी। न नगरपालिका ने जगह सुनिश्चित की, न कोई जनप्रतिनिधि पहुंचा, न कोई अधिकारी। सवाल उठता है—क्या यही आदिवासी बाजार है? क्या यही उनकी पहचान है? कब तक ये आदिवासी अपनी थोड़ी-सी उपज बेचने के लिए भी परेशान होते रहेंगे? कब तक उनके साथ ऐसा खिलवाड़ होता रहेगा?
एक आदिवासी की मौन पुकार है—“क्या कोई प्रशासन है? कोई जनप्रतिनिधि है? कोई है जो हमारे दर्द को समझे और कहे कि यहां आकर बैठो, अपनी सब्जियां बेचो?” क्या अंधेर नगरी जैसी नगरपालिका व्यवस्था में कभी यह संभव होगा?
दिवाली की चमक में छिपी इस अंधेरी सच्चाई को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये सिर्फ जगह की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता और संवेदनहीनता का सवाल है। आदिवासियों की मेहनत और उनकी आजीविका की रक्षा कब होगी? कब तक वे अपनी उपज लेकर लौटते रहेंगे?
किरंदुल की यह तस्वीर पूरे बस्तर की पीड़ा का प्रतीक बन गई है। अगर प्रशासन और जनप्रतिनिधि अब भी नहीं जागे तो ये आदिवासी और कितने दिवाली निराशा में बिताएंगे?

