*दंतेवाड़ा: बचेली सरकारी शराब दुकान में MRP से अधिक बिक्री और कालाबाजारी के आरोप—पुराने घोटाले की छाया अब भी?*
दंतेवाड़ा जिले के बचेली स्थित सरकारी (CSMCL) शराब दुकान पर शराब प्रेमियों की लगातार शिकायतें आ रही हैं कि कुछ ब्रांड की शराब निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से 20 से 40 रुपये अधिक में बेची जा रही है। विक्रेताओं से पूछने पर जवाब मिलता है कि “ऊपर से आदेश है, रेट बढ़कर आया है।” वहीं कई लोकप्रिय ब्रांड सरकारी दुकान पर उपलब्ध नहीं बताए जाते, लेकिन बचेली क्षेत्र के बाहरी “कोचीये” (स्थानीय भाषा में थोक खरीदार/ब्लैक मार्केट विक्रेता) के पास 100 से 150 रुपये अधिक रेट पर आसानी से मिल जाते हैं। सवाल उठता है—ये ब्रांड कोचीयों तक कहां से और कैसे पहुंच रहे हैं?
पृष्ठभूमि और पिछले मामले
यह समस्या नई नहीं है। अगस्त 2025 में स्थानीय रिपोर्ट्स में बचेली सरकारी दुकान पर MRP से 40-50 रुपये अधिक बिक्री का आरोप लगा था। दैनिक बिक्री 5-6 लाख रुपये बताई गई थी और अनुमान लगाया गया था कि अतिरिक्त वसूली से रोजाना एक लाख रुपये से अधिक अवैध कमाई हो सकती है। उसी समय दुकान कर्मचारियों और अवैध कोचीयों के बीच सांठगांठ का जिक्र भी हुआ था, जिसमें लोकप्रिय ब्रांड सरकारी काउंटर पर “नहीं” बताकर बाहर महंगे बेचे जाने की बात कही गई।
Yनवंबर-दिसंबर 2025 में और बड़ा मामला सामने आया। बचेली की विदेशी कंपोजिट मदिरा दुकान में करीब 1.52 करोड़ रुपये की स्टॉक और कैश शॉर्टेज पाई गई। जांच में पाया गया कि कर्मचारियों ने सरकारी QR कोड हटाकर निजी QR (PhonePe/Google Pay) लगाकर बिक्री की रकम अपने खातों में डाली और स्टॉक रजिस्टर में हेरफेर किया। आबकारी उपनिरीक्षक अजय शर्मा समेत कई सेल्समैन (दीपक यादव, के. चंद्रशेखर, देवेंद्र पैकरा आदि) गिरफ्तार हुए और जेल भेजे गए। आरोप था कि अप्रैल 2024 से यह खेल चल रहा था।
Dailychhattisgarh2023 में भी दंतेवाड़ा की दुकानों पर MRP मिटाकर या अधिक दाम वसूलने की शिकायतें दर्ज हुई थीं।“कोचिया” सिस्टम क्या है?छत्तीसगढ़ में “कोचिया/कोचीये” उन लोगों को कहा जाता है जो सरकारी दुकानों से (कई बार नियमों से अधिक मात्रा में) शराब खरीदकर गांवों, बस्तियों या काले बाजार में ऊंचे दाम पर बेचते हैं। नियमों के अनुसार एक व्यक्ति को सीमित मात्रा ही बेची जा सकती है, लेकिन वीडियो और शिकायतों में बल्क बिक्री के आरोप लगते रहे हैं। जब सरकारी दुकान पर कुछ ब्रांड “स्टॉक नहीं” बताए जाते और वे बाहर महंगे उपलब्ध होते हैं, तो सांठगांठ का संदेह गहराता है—क्या स्टॉक जानबूझकर रोककर कोचीयों को दिया जा रहा है?
विश्लेषण: सिर्फ स्थानीय गड़बड़ी या व्यवस्था की खामी?
ऊपर से आदेश का दावा: विक्रेता “रेट बढ़कर आया” कहते हैं, लेकिन आधिकारिक MRP में अचानक स्थानीय बढ़ोतरी का कोई सार्वजनिक नोटिफिकेशन उपलब्ध नहीं। यह या तो झूठा बहाना है या फिर अनधिकृत निर्देश, दोनों ही गंभीर हैं।
ब्रांड की अनुपलब्धता: सरकारी दुकान पर न मिलना और कोचीयों पर महंगा मिलना सप्लाई चेन में लीकेज या जानबूझकर डायवर्जन का संकेत देता है।
पिछली कार्रवाई के बावजूद दोहराव: 2025 के गिरफ्तारियों के बाद भी शिकायतें जारी रहना निगरानी और जवाबदेही की कमी दर्शाता है। पूरे राज्य में ओवररेटिंग और कालाबाजारी की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
यह मामला सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि सरकारी शराब वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। उपभोक्ता को सही MRP पर सही ब्रांड मिलना चाहिए—न कि “ऊपर से आदेश” या कोचीये के जरिए अतिरिक्त बोझ। आबकारी प्रशासन से पारदर्शी जांच और कड़ी कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है।

