*किरंदुल में उप मुख्यमंत्री अरुण साव का ऐतिहासिक दौरा: करोड़ों की सौगात, लेकिन विवाद और सवालों का घेरा*
दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में कल का दिन विकास की नई उम्मीदों और पुराने विवादों का गवाह बना। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव के दौरे के दौरान 3 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले ऑक्सीजन पार्क का उद्घाटन, करोड़ों रुपये के विभिन्न कार्यों का भूमिपूजन और लंबे समय से खड़ी पानी की टैंकरों व JCB मशीनों का उद्घाटन हुआ। स्थानीय जनता के लिए यह दिन विकास कार्यों की बरसात साबित हुआ, लेकिन कांग्रेस के विरोध और स्थानीय समस्याओं के बीच कई सवाल भी खड़े हो गए।
*विकास की सौगात: ऑक्सीजन पार्क और अन्य कार्य*
उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने किरंदुल में ऑक्सीजन पार्क का अनावरण किया। यह पार्क पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके अलावा, नगरपालिका क्षेत्र में लंबे समय से इंतजार कर रही पानी की टैंकरों और JCB मशीनों का भी उद्घाटन किया गया, जो छह महीने से अधिक समय से बिना उपयोग के खड़ी थीं।
साथ ही, करोड़ों रुपये की लागत वाले विभिन्न विकास कार्यों का भूमिपूजन भी हुआ। इन कार्यों से किरंदुल और आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के विकास को गति मिलने की उम्मीद है। भाजपा सरकार इस दौरे को स्थानीय स्तर पर विकास की प्रतिबद्धता के रूप में पेश कर रही है।
*कांग्रेस का तीखा विरोध: महेंद्र कर्मा का नाम और मूर्ति*
कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उप मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध दर्ज कराया। उनका मुख्य मुद्दा ऑक्सीजन पार्क का नाम परिवर्तन था। कांग्रेसियों का आरोप है कि इस पार्क का मूल भूमिपूजन स्वर्गीय महेंद्र कर्मा (कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक) के नाम से हुआ था। अब नाम बदल दिया गया और पार्क में महेंद्र कर्मा की मूर्ति भी नहीं लगाई गई।
कांग्रेस ने इसे राजनीतिक संकीर्णता करार दिया और कड़ा विरोध जताया। यह विवाद स्थानीय राजनीति की गहराई को दर्शाता है, जहां विकास कार्य भी स्मृति और श्रद्धांजलि के मुद्दों से जुड़ जाते हैं।
*शुद्ध पेयजल की मांग: मलंगीर नाला पर खतरा*
किरंदुल और बचेली नगरपालिका अध्यक्षों ने उप मुख्यमंत्री के समक्ष शुद्ध पेयजल की गंभीर समस्या रखी। मलंगीर नाला से पानी की आपूर्ति की मांग की गई, जो किरंदुल की जल कमी को दूर कर सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों में चिंता है। मलंगीर नाला प्राकृतिक जल स्रोत 13 नम्बर खदानों से जुड़ा हुआ है। रामाबूटी जैसे अन्य स्रोतों की तरह, पहाड़ों की खुदाई से ये स्रोत सूखते जा रहे हैं। जल्द ही 13 नंबर खदान में माइनिंग शुरू होने वाली है, जिससे मलंगीर जल स्रोत लुप्त होने का खतरा है।
सवाल यह है: क्या मलंगीर से स्थायी जल आपूर्ति की मांग विकास के लिए जायज है या यह सरकारी करोड़ों रुपये का दुरुपयोग होगा? जब स्रोत खुद खतरे में हैं, तो बड़े-बड़े पाइपलाइन प्रोजेक्ट कितने टिकाऊ होंगे?
*पुरानी मांगें: बस स्टैंड, ट्रांसपोर्ट नगर और पट्टा*
किरंदुल की जनता वर्षों से ट्रांसपोर्ट नगर और बस स्टैंड के विस्तार की मांग कर रही है। करोड़ों रुपये स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन ट्रांसपोर्ट नगर अभी भी खाली हाथ है। भारी ट्रकों की आमद से रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है।
चुनावी वादे के अनुसार, भाजपा सरकार ने सभी को पट्टा (भूमि अधिकार पत्र) देने का वादा किया था। नगरपालिका अध्यक्ष ने इसे मंत्री के सामने रखा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं, लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या यह सिर्फ चुनावी लॉलीपॉप था? अध्यक्ष बनते ही अखबारों में छपी सुर्खियां अब 1.6 महीने बीतने के बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बन पाई हैं।
*पानी की पाइपलाइनें और मुक्तिधाम: जनता के पैसे की बर्बादी?*
एक छोटे से नगर किरंदुल में तीन बार पाइपलाइन बिछाई गई है। हर गली में तीन पाइपलाइन होने के बावजूद जल संकट बरकरार है। जनता पूछ रही है कि सरकारी धन की यह बर्बादी क्यों?
इसी तरह, गांधीनगर में करोड़ों की लागत से बना मुक्तिधाम जैसा हाट बाजार पहले से वीरान पड़ा है। फिर नया मुक्तिधाम बनाने की मांग क्या है? क्या यह दोबारा भ्रष्टाचार को न्योता देना नहीं होगा?
*जनता की अपेक्षाएं और चुनौतियां*
किरंदुल की जनता विकास कार्यों का इंतजार कर रही है। पट्टा, शुद्ध पानी, ट्रांसपोर्ट नगर और सही उपयोग की मांगें लगातार बनी रहेंगी। उप मुख्यमंत्री के दौरे ने कुछ कामों को गति दी है, लेकिन लंबे समय से चली आ रही समस्याएं और पर्यावरणीय खतरे (खनन से जल स्रोतों का विनाश) बड़े सवाल खड़े करते हैं।
निष्कर्ष: विकास सराहनीय है, लेकिन वह टिकाऊ, पारदर्शी और जन-केंद्रित होना चाहिए। नाम विवाद, संसाधनों की बर्बादी और खनन-पर्यावरण टकराव पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। किरंदुल जैसे खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास का मॉडल सिर्फ उद्घाटन और भूमिपूजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों की रक्षा भी करनी चाहिए।
जनता अब इंतजार कर रही है कि ये सौगातें कागजों और फीते काटने तक ही सीमित रहेंगी या वाकई जमीनी बदलाव लाएंगी। उप मुख्यमंत्री अरुण साव और स्थानीय प्रशासन पर अब इन मुद्दों को प्राथमिकता देने का दबाव है।

