*किरंदुल में मृत्यु के बाद भी सुविधा नहीं: शव को 100 किमी तक ले जाने के लिए फ्रिजर युक्त शव वाहन तक नहीं, क्या है कुबेर नगरी की सच्चाई?*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): खनिज सम्पदा से भरपूर छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला दुनिया भर में अपनी प्राकृतिक संपदा के लिए जाना जाता है। नवरत्न कंपनी एनएमडीसी की परियोजनाएं यहां चल रही हैं, लाखों-करोड़ों का राजस्व जमा होता है और नगरपालिका किरंदुल कर वसूली में भी पीछे नहीं है। लेकिन जब बात अपने नागरिकों की आखिरी यात्रा की आती है, तो तस्वीर बिल्कुल उलट जाती है।
शनिवार 30 मई की रात करीब 12:15 बजे किरंदुल में एक व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। परिवार ने शव को उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए एनएमडीसी किरंदुल परियोजना अस्पताल से फ्रिजर युक्त शव वाहन (मर्चरी वैन) की मांग की। लेकिन अस्पताल प्रबंधन का जवाब था — “ऐसा कोई वाहन उपलब्ध नहीं है।”
*पूरी रात चला परिवार का संघर्ष*
*किरंदुल, बचेली और दंतेवाड़ा कहीं भी फ्रिजर युक्त शव वाहन उपलब्ध नहीं हुआ।*
जगदलपुर से व्यवस्था करने की कोशिश की गई, लेकिन वहां भी पर्याप्त सुविधा नहीं मिली।
अस्पताल में रखे फ्रिजर को दो अलग-अलग एंबुलेंस में फिट करने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों के इन्वर्टर खराब निकले।
आखिरकार अस्पताल प्रबंधन ने एक पुरानी शव वाहन दी, जिसे 5 महीने पहले कबाड़ घोषित कर दिया गया था।
सुबह 7 बजे परिवार मजबूरी में उसी खस्ताहाल वाहन में शव लेकर रवाना हुआ। 70-80 किलोमीटर तय करने के बाद कोड़ेनार में वाहन खराब हो गया। फिर जगदलपुर से दूसरी एंबुलेंस बुलानी पड़ी।
लगभग 7 घंटे तक मृतक के परिजन शव के साथ बेबसी की हालत में इंतजार करते रहे। गर्मी के मौसम में शव को बिना उचित संरक्षण के रखने की मजबूरी परिवार के लिए अतिरिक्त मानसिक यातना बन गई।
सवाल जो खड़े होते हैं:
क्या छत्तीसगढ़ की सबसे धनी मानी जाने वाली कुबेर नगरी किरंदुल में एक भी फ्रिजर युक्त शव वाहन नहीं रखा जा सकता?
एनएमडीसी जैसी नवरत्न कंपनी, जो अरबों रुपये का मुनाफा कमाती है, क्या अपने परियोजना क्षेत्र में मृत कर्मचारी या आम नागरिक के लिए यह बुनियादी सुविधा भी नहीं उपलब्ध करा सकती?
*अगर मृत व्यक्ति एनएमडीसी का नियमित कर्मचारी या अधिकारी होता, तो क्या स्थिति अलग होती? या उनके लिए भी यही बेबसी होती?*
नगरपालिका किरंदुल जो लाखों रुपये का कर वसूलती है, अपने नागरिकों की अंतिम यात्रा के लिए क्यों जिम्मेदार नहीं?
मात्र 15 दिनों में यह दूसरा मामला है, जब एनएमडीसी अस्पताल में एंबुलेंस नहीं मिलने की शिकायत आई। पहले एक घायल व्यक्ति को भी यही हालात झेलने पड़े। क्या स्वास्थ्य सेवाओं की यह बदहाली सामान्य हो गई है?
दंतेवाड़ा जिले की खनिज संपदा देश की विकास यात्रा में अहम योगदान देती है, लेकिन स्थानीय लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य और अंतिम संस्कार जैसी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। यह विरोधाभास चिंताजनक है।
प्रशासन, एनएमडीसी और नगरपालिका किरंदुल से अब जवाब मांगा जा रहा है — क्या खनिज नगरी में मरने वाले व्यक्ति को भी इतनी बेबसी झेलनी पड़ेगी? या अब जिम्मेदार संस्थाएं इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगी?

