*कुबेर नगरी किरंदुल का शर्मनाक सब्जी बाजार: पैदल आने वाले आदिवासी ग्रामीणों का क्रूर शोषण, सड़क पर मौत का खेल, नगरपालिका और व्यापारी संगठनों की घोर लापरवाही!*

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*कुबेर नगरी किरंदुल का शर्मनाक सब्जी बाजार: पैदल आने वाले आदिवासी ग्रामीणों का क्रूर शोषण, सड़क पर मौत का खेल, नगरपालिका और व्यापारी संगठनों की घोर लापरवाही!*

किरंदुल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित यह छोटी सी नगरपालिका, बैलाडीला लौह अयस्क खदानों के कारण “कुबेर नगरी” के नाम से मशहूर है। यहां की मिट्टी सोने-चांदी से कम मूल्यवान नहीं, लेकिन उसकी सच्चाई यह है कि हजारों आदिवासी ग्रामीणों के लिए यहां का एकमात्र सब्जी बाजार नरक बन चुका है। समय के साथ बढ़ती आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 18,887, अब और बढ़ चुकी है खनन गतिविधियों के कारण) और स्थानीय व्यापारियों की लालच ने इस बाजार को इतना सिकोड़ दिया है कि 15-20 गांवों (0 से 30 किमी दायरे) से आने वाले गरीब आदिवासी किसानों को 2 फीट की जगह भी नहीं मिलती। वे मजबूरन मुख्य सड़क पर बैठते हैं, जहां 12-14 चक्कों वाले भारी ट्रक रोजाना मौत का साया बनकर गुजरते हैं। यह लज्जास्पद, अमानवीय और घोर अन्याय है कि कुबेर नगरी में खजाने के मालिकों को गरीबों के लिए दो वक्त की रोटी कमाने की जगह तक नहीं दी जाती।

किरंदुल का मुख्य सब्जी बाजार एक छोटी सी पट्टी है जहां आसपास के गांवों के हजारों आदिवासी ग्रामीण रोजाना अपनी मेहनत की उपज—सब्जियां, फल, महुआ, तेंदू पत्ता या अन्य वनोपज—बेचने आते हैं। ये लोग 5, 10, 20 किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं, सिर पर बोझ लादे, भूखे-प्यासे। लेकिन बाजार पहुंचते ही उनकी उम्मीदें चूर-चूर हो जाती हैं। स्थानीय सब्जी व्यापारी अपनी लंबी-चौड़ी पक्की दुकानों के साथ ही एक-एक व्यापारी की 4-4 दुकानें हैं। जो पक्का मालिक है, वह अपनी दुकान के आगे सड़क पर लंबी-लंबी अस्थायी दुकानें लगा लेता है। परिणाम? बाजार संकुचित हो गया है। ग्रामीणों को 2 फीट जगह नहीं मिलती जिसमें वे खुद बैठ सकें, एक टुकना रख सकें और 2-3 फीट का गमछा या चावल का बोरा बिछाकर सामान सजा सकें।

विडंबना यह कि आसपास के उड़ीसा और जगदलपुर से आने वाले बड़े व्यापारी भी इन आदिवासियों को जगह नहीं देते। वे घेरा बनाकर बैठ जाते हैं। मजबूरन ग्रामीण मुख्य सड़क पर उतर आते हैं—जहां भारी वाहनों का तांता लगा रहता है। दुर्घटना का खतरा मोल लेते हुए वे अपनी उपज बेचते हैं। एक छोटी सी चूक, और परिवार का रोटी-रोटी का सहारा हमेशा के लिए खत्म! यह क्रूरता है, मानवाधिकारों का हनन है।

बाजार में बैठने के बाद भी इन गरीबों का शोषण जारी रहता है।कुछ ऐसे खरीदार—कुछ ऐसे स्थानीय नागरिक, कुछ ऐसे व्यापारी—निर्दय मोलभाव करते हैं। 50 रुपये का पपीता 20 रुपये में मांगते हैं। कुछ तो सुनकर शर्म आती है—वे जानबूझकर 4 सब्जियां लेते हैं और 2 की ही पैसे देते हैं। कई लोग अच्छी सब्जी-फल देखकर भीड़ का फायदा उठाकर चोरी कर लेते हैं। इन ग्रामीणों के मन में यह ख्याल तक नहीं आता कि सामने वाला पैदल 10-20 किमी चलकर आया है, उसके पास कोई स्टोरेज नहीं, कोई परिवहन नहीं—फिर भी वे लूट लेते हैं। यह शर्मनाक, निंदनीय और अमानवीय शोषण है। आदिवासी ग्रामीणों की मजबूरी का फायदा उठाना सभ्य समाज के लिए कलंक है जबकि ऐसे लोग बड़ी दुकानों या मोल मे जाते है तो बिना मौलभाव के समान सब्जियाँ लेते है।

इस पूरे मसले में दो प्रमुख व्यापारी संगठन—बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ और किरंदुल चैंबर ऑफ कॉमर्स—पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। इन संगठनों का वजूद है, बैठकें होती हैं, लेकिन ग्रामीण व्यापारियों के लिए जगह का कोई प्रावधान नहीं। वे चुपचाप तमाशा देखते हैं। क्या इन संगठनों का मकसद सिर्फ बड़े व्यापारियों की हिफाजत करना है? छोटे आदिवासी विक्रेताओं को कुचलना?

नगरपालिका की भूमिका और भी घोर लापरवाही भरी है। किरंदुल नगरपालिका कुछ दिनों में बाजार व्यवस्था के लिए “सूची” जारी कर देते है। लेकिन 2-4 हफ्तों में सब ज्यों-का-त्यों। कोई स्थायी समाधान नहीं। वर्तमान नगरपालिका अध्यक्ष रूबी शैलेंद्र सिंह इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठी हैं। उन्होंने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उनकी चुप्पी अक्षम्य है। उल्लेखनीय है कि उनके पति शैलेंद्र सिंह पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष थे। उन्होंने 15 साल पहले गांधीनगर में हाट बाजार का निर्माण करोड़ों रुपये खर्च कर कराया था। लेकिन आज वह बाजार वीरान पड़ा है—खाली, बेकार, जंग खाता हुआ। क्या करोड़ों की लागत सिर्फ दिखावा थी? क्यों नहीं उसे सक्रिय कर ग्रामीण विक्रेताओं के लिए इस्तेमाल किया जाता? क्यों नहीं वहां व्यवस्थित जगह दी जाती जहां वे सुरक्षित बैठ सकें?

यह विरोधाभास कुबेर नगरी की सच्चाई उजागर करता है। एक तरफ खदानों से अरबों का राजस्व, NMDC जैसी कंपनियां, अमीर व्यापारी; दूसरी तरफ गरीब आदिवासी जिनकी उपज बिना बिकी सड़ती रहती है या सस्ते दामों में लूटी जाती है। बढ़ती आबादी के बावजूद बाजार का विस्तार क्यों नहीं किया गया? क्यों कोई प्लानिंग नहीं? नगरपालिका क्या सिर्फ टैक्स वसूलने और चुनावी शोभा यात्राओं के लिए है?

समाधान की मांग तत्काल होनी चाहिए:

गांधीनगर हाट बाजार को तुरंत सक्रिय करें और ग्रामीणों के लिए अलग से व्यवस्थित स्थान आवंटित करें।

मुख्य बाजार का विस्तार कर सड़क किनारे अतिक्रमण हटाएं।

व्यापारी संगठनों को ग्रामीण विक्रेताओं के लिए जगह सुनिश्चित करने का निर्देश दें।

चोरी, ठगी, अत्यधिक मोलभाव पर सख्त कार्रवाई—पुलिस और नगरपालिका संयुक्त अभियान चलाएं।

पैदल आने वालों के लिए बस/वाहन व्यवस्था या सप्ताह में 2-3 बाजार दिवस बढ़ाएं।

अध्यक्ष रूबी सिंह को जवाबदेह ठहराएं—जनता के सवालों का सामना करें।

कब तक ये गरीब ग्रामीण दर-बदर ठोकरें खाते रहेंगे? कब तक सड़क पर ट्रकों के नीचे कुचले जाने का डर सहेगे? कुबेर नगरी की समृद्धि का फल सिर्फ कुछ अमीरों तक क्यों सीमित? यह सामाजिक न्याय का सवाल है। प्रशासन, व्यापारी संघ और नगरपालिका अध्यक्ष—अगर आप चुप रहे तो इतिहास आपको अन्याय का साथी करार देगा। तत्काल कार्रवाई हो, वरना यह शर्मनाक स्थिति और बिगड़ती रहेगी। किरंदुल के आदिवासी ग्रामीणों की आवाज अब गूंजनी चाहिए—जगह दो, सम्मान दो, न्याय दो!

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