*दक्षिण बस्तर में पत्रकारिता की हत्या: बीजेपी जिलाध्यक्ष की धमकियों से निडर कलमें डर के साये में, साधारण नागरिकों का क्या होगा?*
दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ (विशेष संवाददाता): दक्षिण बस्तर का जंगल नक्सलियों की भयावह छाया से घिरा हुआ था, लेकिन समय के साथ-साथ वह डर धीरे-धीरे समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहा था। विकास की किरणें चमकने लगी थीं, और क्षेत्र के लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन अब, नक्सली खतरे के स्थान पर एक नया भयानक खतरा उभर रहा है – राजनेताओं की गुंडागर्दी और धमकियां! यहां के पत्रकार, जो कभी नक्सलियों के बीच दोहरी तलवार की धार पर चलते हुए निष्पक्ष पत्रकारिता का निर्भीक निर्वहन करते थे, आज बीजेपी जैसे ‘साफ-सुथरी’ छवि वाली पार्टी के जिलाध्यक्ष की धमकियों से कांप रहे हैं। यह शर्मनाक घटना न केवल पत्रकारिता के लोकतांत्रिक स्तंभ को कमजोर कर रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र के साधारण नागरिकों को भी चुप्पी का शिकार बना रही है। क्या यही है वह ‘नई भारत’ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘हर भारतीय बिना डर-भय के जिए’ का नारा बुलंद करते हैं?
ताजा मामला दंतेवाड़ा जिले का है, जहां दैनिक भास्कर के युवा पत्रकार लोकेश शर्मा और पब्लिक स्वर के पत्रकार डी.एम. सोनी अपनी निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता के चलते बीजेपी जिलाध्यक्ष संतोष गुप्ता की काली करतूतों को उजागर करने के कारण मौत के साये में जीने को मजबूर हो चुके हैं। इन पत्रकारों ने गुप्ता के भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और क्षेत्रीय मुद्दों पर खुलकर खबरें प्रकाशित कीं, जिसके जवाब में उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। कल्पना कीजिए, वे कलम वाले योद्धा जो नक्सली बंदूकों के बीच सच्चाई की आवाज बने रहते थे, आज एक राजनेता की गुंडागर्दी से डर रहे हैं! यह घटना न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है, बल्कि बीजेपी की कथित ‘साफ-सुथरी नीतियों’ की पोल खोल रही है। क्या यही वह पार्टी है जिसके कार्यकर्ता आज देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं और जिनकी छवि को दुनिया का ‘सबसे ऊंचा दर्जे का नेता’ कहा जाता है? अफसोस, ऐसे दागी नेताओं की मौजूदगी से बीजेपी की पूरी छवि धूल में मिल रही है।
इस घटना का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दक्षिण बस्तर में पत्रकारिता अब एक घातक जुआ बन चुकी है। लोकेश शर्मा और डी.एम. सोनी जैसे युवा पत्रकारों ने संतोष गुप्ता के खिलाफ खबरें छापीं, जिनमें उनके क्षेत्रीय सत्ता के दुरुपयोग, जनता को ठगने के आरोप शामिल थे। गुप्ता, जो खुद को बीजेपी का चेहरा बताते हैं, ने इन खबरों को ‘माने तो स्रोतों के अनुसार, गुप्ता ने खुलेआम कहा कि मै सत्ताधारी पार्टी का हुँ मेरा कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता। यह धमकी न केवल व्यक्तिगत है, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के लिए एक चेतावनी है। दक्षिण बस्तर पत्रकार संघ ने इन दोनों पत्रकारों के साथ खुलकर खड़े होने का ऐलान किया है, जो सराहनीय है। संघ के अध्यक्ष ने कहा, “हम नक्सलियों से नहीं डरे, राजनेताओं की गुंडागर्दी से कैसे डरेंगे? लेकिन यह सिस्टम की विफलता है कि ऐसे गुंडे सत्ता के गलियारों में घूम रहे हैं।”
कड़वी सच्चाई यह है कि जब निडर पत्रकार ही डर के साये में जीने लगें, तो साधारण व्यक्ति का क्या हाल होगा? दक्षिण बस्तर के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लाखों लोग पहले ही नक्सलवाद, गरीबी और विकास की कमी से जूझ रहे हैं। वे आवाज उठाने से पहले लाखों बार सोचेंगे – ‘मेरा परिवार का क्या होगा? क्या मेरी जान पर बनेगी?’ यह स्थिति लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी का नारा ‘हर भारतीय बिना डर-भय के जिए, आपका चौकीदार जाग रहा है’ सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत में दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में बीजेपी के ही जिलाध्यक्ष पत्रकारों को डरा रहे हैं। क्या यह चौकीदार सो रहा है, या फिर सत्ता के आकाओं की गुंडागर्दी को संरक्षण दे रहा है? बीजेपी की नीतियां साफ-सुथरी होने का दावा करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में उनके नेता गुंडा राज चला रहे हैं। संतोष गुप्ता जैसे तत्व पार्टी की छवि को कलंकित कर रहे हैं, और अगर पार्टी ने इन्हें कट्टरता से सबक नहीं सिखाया, तो यह उनकी नैतिक दिवालियापन साबित होगा।
यह घटना केवल दंतेवाड़ा तक सीमित नहीं है; यह पूरे देश के लिए एक खतरे की घंटी है। छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पत्रकारिता पहले से ही चुनौतीपूर्ण है। नक्सली धमकियां एक तरफ, सरकारी तंत्र की उदासीनता दूसरी तरफ, और अब राजनेताओं की गुंडागर्दी – यह तिकड़ी पत्रकारों को कुचल रही है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा समिति को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। लोकेश शर्मा और डी.एम. सोनी ने स्पष्ट कहा है कि वे डरते नहीं और खुलकर सामना करेंगे, लेकिन क्या सरकार उन्हें सुरक्षा देगी? दक्षिण बस्तर पत्रकार संघ की एकजुटता प्रशंसनीय है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं। बीजेपी को चाहिए कि संतोष गुप्ता जैसे नेताओं पर कार्रवाई करे, वरना उनकी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बातें खोखली साबित होंगी।
अंत में, यह सवाल उठता है: क्या भारत का लोकतंत्र इतना कमजोर हो गया है कि एक जिलाध्यक्ष की धमकी से कलमें कांपने लगें? दक्षिण बस्तर के लोग नक्सलवाद से लड़कर शांति की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन राजनेताओं की इस गुंडागर्दी ने फिर से भय का अंधेरा फैला दिया है। समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें जागें, पत्रकारों की रक्षा करें, और ऐसे दागी नेताओं को सत्ता से दूर करें। अन्यथा, साधारण नागरिकों की आवाज हमेशा के लिए दब जाएगी, और ‘चौकीदार’ का नारा केवल चुनावी जुमला साबित होगा। यह घटना न केवल पत्रकारिता के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक काला अध्याय है – इसे नजरअंदाज करने का मतलब है लोकतंत्र की हत्या!
