*किरंदुल बिग ब्रेकिंग: शुदखोरी का काला जाल! 3 साल में 4 लाख से 70 लाख कर्ज, ऑनलाइन सट्टे की लत और परिवार का त्याग… एक व्यक्ति की दर्दभरी जंग, जो सैकड़ों परिवारों की कहानी बन चुकी है*
किरंदुल, 6 नवंबर 2025 (विशेष संवाददाता): बैलाडीला की खदानों के बीच बसी इस छोटी सी जगह पर एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी को तबाह कर रही है, बल्कि पूरे समुदाय को सोचने पर मजबूर कर दिया है। शुदखोरी—वह काला धंधा जो अवैध ब्याज के जाल में फंसाकर परिवारों को बर्बादी की राह पर धकेल देता है। यहां एक 40 वर्षीय व्यक्ति (नाम गोपनीय) की आपबीती ऐसी है कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शुरूआत हुई 4 लाख के छोटे से कर्ज से, जो व्यापारिक नुकसान की भरपाई के लिए लिया गया। लेकिन आज, मात्र 3 सालों में यह कर्ज 70-80 लाख रुपये का पहाड़ बन चुका है। और अब? व्यक्ति न सिर्फ आर्थिक रूप से टूट चुका है, बल्कि परिवार ने भी उसे बेदखल कर दिया है। तनाव इतना कि वह अनुचित रास्तों की ओर बढ़ रहा है—क्या यह मौत का रास्ता ही एकमात्र निकास बचा है?
*दर्दभरी आपबीती: एक कदम से कंगाली की चक्रव्यूह*
पीड़ित की जुबानी: “व्यापार में नुकसान हुआ तो पहले शुदखोर से 4 लाख रुपये 7% मासिक ब्याज पर लिए। लेकिन ब्याज चुकाने का चक्कर ही मेरी तबाही का कारण बना। एक शुदखोर का ब्याज भरने के लिए दूसरे के जाल में फंस गया। फिर आया ऑनलाइन क्रिकेट सट्टेबाजी का भूत—15-20 लाख रुपये यहीं उड़ गए।”
एक के बाद एक शुदखोरों की फौज ने उसे घेर लिया। कोई 10% ब्याज पर, कोई 15-20% पर पैसे उधार देता गया। मूलधन चुकाने के नाम पर ब्याज का बोझ बढ़ता चला गया। आज स्थिति ऐसी है कि हर महीने 5 लाख रुपये से ज्यादा सिर्फ ब्याज ही चुकाने पड़ रहे हैं! किरंदुल जैसे छोटे शहर में, जहां औसत आय महज हजारों में है, यह रकम किसी के लिए भी कल्पना से परे है। पीड़ित बताते हैं, “पिता जी ने चल-अचल संपत्ति से बेदखल कर दिया। अब न आय का कोई स्रोत, न कर्ज चुकाने का रास्ता। तनाव इतना कि नींद नहीं आती, जिंदगी बोझ लगती है।”
किरंदुल हो या बैलाडीला, छत्तीसगढ़ का यह माइनिंग बेल्ट आर्थिक उन्नति का प्रतीक है, लेकिन शुदखोरी का जाल यहां परिवारों को खोखला कर रहा है। 5% से शुरू होकर 20% तक मासिक ब्याज—यह दरें न सिर्फ अवैध हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ सूदखोरी निषेध अधिनियम 1964 के तहत अधिकतम 18% वार्षिक ब्याज ही वैध है। लेकिन शुदखोर कानून को ठेंगा दिखाते हैं। वे बिना लाइसेंस के बैंकिंग का धंधा चला रहे हैं, जहां मूलधन से ज्यादा ब्याज वसूलना आम बात है।
विश्लेषण करें तो यह चक्रव्यूह है: छोटा कर्ज लो, ब्याज न चुकाओ तो नया कर्ज लो, सट्टेबाजी या जुआ की लत लगे तो और गहरा जाओ। परिणाम? परिवार टूटते हैं, संपत्ति हड़पी जाती है, और अंत में हताशा—आत्महत्या या अपराध। किरंदुल में ही 5% आबादी इस जाल में फंसी बताई जा रही है, जहां मासिक ब्याज ही घर का बजट खा जाता है। राज्य स्तर पर देखें तो हाल के महीनों में सरगुजा, कवर्धा और रायपुर में शुदखोरी गैंग्स पर बड़ी कार्रवाई हुई—13 लाख के कर्ज पर 30 लाख वसूली, या 17 लाख पर 40 लाख की उगाही। लेकिन किरंदुल जैसे दूरदराज इलाकों में यह धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है, क्योंकि पीड़ित शर्म या डर से पुलिस के पास नहीं जाते। सबूतों की कमी से पुलिस हाथ बंधे रहते हैं।
पुलिस की अपील: ‘आइए, हम साथ हैं—शुदखोरों पर तत्काल कार्रवाई’
इस मामले की पड़ताल में पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी से बात की गई। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने कहा, “अगर कोई पीड़ित हमारे पास आता है, तो तत्काल सहायता दी जाती है। शुदखोरों के नाम और सबूत मिलने पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित। हमने पहले भी ऐसे गैंग्स को पकड़ा है, और आगे भी करेंगे।” लेकिन सवाल वही: पीड़ित कब आवाज उठाएंगे? किरंदुल में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं, जहां परिवार हताशा में जिंदगी की जंग हार रहे हैं।
जागरूकता का आह्वान: वन-वे रोड से बचें, मदद लें
यह सिर्फ एक पीड़ित की कहानी नहीं—यह सैकड़ों मूक पीड़ितों की पुकार है, जो मान-सम्मान के डर से घरों में सड़ रहे हैं। किरंदुल, दंतेवाड़ा जिला या पूरे छत्तीसगढ़ में ऐसे कितने परिवार शुदखोरों के बोझ तले दबे होंगे? समय है जागने का। अगर आप या आपके जानने वाले फंसे हैं, तो चुप न रहें। नजदीकी थाने या हेल्पलाइन (100) पर संपर्क करें। शुदखोरी का यह काला धंधा तब तक नहीं रुकेगा, जब तक पीड़ित न बोलें। वरना, बर्बादी का रास्ता जो एक बार शुरू होता है, उसका अंत सिर्फ मौत ही है।
