*किरंदुल में शुदखोरी का जाल: ऊंची ब्याज दरें कैसे बदल रही हैं परिवारों को बर्बादी में*

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*किरंदुल में शुदखोरी का जाल: ऊंची ब्याज दरें कैसे बदल रही हैं परिवारों को बर्बादी में*

किरंदुल, दंतेवाड़ा (31 अक्टूबर 2025): छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल शहर में अवैध शुदखोरी का काला कारोबार न केवल परिवारों को आर्थिक रूप से तोड़ रहा है, बल्कि कई निर्दोषों को मौत की गोद में धकेल रहा है। यहां ऑनलाइन सट्टा, क्रिकेट बेटिंग और गेमिंग की लत ने युवाओं को लाखों-करोड़ों का कर्ज चढ़ा दिया है। मजबूरी में शुदखोरो से 5% से लेकर 20% तक मासिक ब्याज पर उधार लेने वाले लोग ब्याज के चक्रव्यूह में फंसकर गुंडागर्दी, मारपीट और अपमान का शिकार हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक विपदा बन चुकी है, जहां एक छोटा-सा कर्ज महीनों में पहाड़ बन जाता है।

 

*ऑनलाइन जुआ की लत: कर्ज का पहला कदम*

 

किरंदुल जैसे छोटे खनिज-समृद्ध शहर में बेरोजगारी और आर्थिक दबाव के बीच ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने युवाओं को आसान शिकार बना लिया है। ड्रीम11 जैसी ऐप्स से लेकर अवैध सट्टा किंग (जैसे दिसावर) तक, लोग रातोंरात अमीर बनने का सपना देखते हैं। लेकिन हार की स्थिति में लाखों रुपये गंवाने के बाद वे शुदखोरो के चंगुल में फंस जाते हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, विगत कुछ वर्षों में किरंदुल में कम से कम 10-12 ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कर्ज के बोझ तले लोग दब चुके हैं। एक प्रभावित परिवार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मेरा भाई क्रिकेट मैच पर सट्टा खेलते हुए 20 लाख हार गया। मजबूरी में 15% मासिक ब्याज पर लाखों रु उधार लिया, लेकिन ब्याज ही इतना बढ़ गया कि गुंडों की धमकी से वह घर छोड़कर भागा गया।”

 

यह समस्या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं। पूरे देश में अवैध ऑनलाइन बेटिंग का बाजार फल-फूल रहा है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) की रिपोर्ट के मुताबिक, FY25 में ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर 5 अरब से अधिक विजिट्स दर्ज हुए। छत्तीसगढ़ पुलिस ने हाल ही में अंबिकापुर में करोड़ों के अवैध सट्टा रैकेट का भंडाफोड़ किया, जहां दिल्ली तक लिंक थे।

*ऊंची ब्याज दरों का गहरा विश्लेषण: छोटा कर्ज, बड़ा जाल*

साहूकारों द्वारा लगाई जाने वाली 5-20% मासिक ब्याज दरें कानूनी रूप से अवैध हैं। छत्तीसगढ़ सूदखोरी निषेध अधिनियम 1964 के तहत अधिकतम 18% वार्षिक ब्याज ही वैध है, लेकिन अवैध शुदखोर इसे नजरअंदाज कर देते हैं। समस्या की जड़ कंपाउंडिंग इफेक्ट में है—जहां ब्याज पर ब्याज जुड़ता जाता है।

मान लीजिए, एक व्यक्ति 10,000 रुपये 10% मासिक ब्याज पर 12 महीने के लिए उधार लेता है। पहले महीने में ब्याज 1,000 रुपये, लेकिन अगले महीने यह 11,000 पर लगेगा। साल भर बाद कुल राशि बढ़कर लगभग 31,384 रुपये हो जाती है, जिसमें 21,384 रुपये शुद्ध ब्याज होता है। अगर ब्याज दर 20% हो, तो यह आंकड़ा डरावना हो जाता है—साल के अंत में 89,161 रुपये, यानी 79,161 रुपये ब्याज! यह गणना सरल कंपाउंड इंटरेस्ट फॉर्मूला (A = P(1 + r)^t) पर आधारित है, जहां P मूलधन, r मासिक दर और t समय है।

ऐसी दरों पर कर्ज लेना ‘डेब्ट ट्रैप’ का निर्माण करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर माइक्रोफाइनेंस और अवैध लोन ऐप्स से जुड़े मामले सालाना 20% बढ़ रहे हैं। कर्नाटक में हाल के मामलों में अनलाइसेंस्ड लेंडर्स ने उधारीदारों को परेशान कर आत्महत्याओं और पलायन को जन्म दिया। छत्तीसगढ़ में भी यही पैटर्न दिख रहा है—कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज, फिर गुंडागर्दी, और अंत में हताशा।

*प्रभावित परिवारों की कहानियां: बर्बादी का चक्र*

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2024 में कर्ज-संबंधी आत्महत्याएं 15% बढ़ीं, जिनमें 40% ऑनलाइन जुआ से जुड़ीं। छत्तीसगढ़ में 2023-25 के बीच 200 से अधिक ऐसे मामले दर्ज हुए।

*समाधान की राह: जागरूकता और सख्ती जरूरी*

स्थानीय प्रशासन ने साहूकारों पर नकेल कसने के लिए विशेष ड्राइव शुरू की है। दंतेवाड़ा मे अवैध सट्टा ऐप्स पर निगरानी बढ़ा रहे हैं और कर्ज प्रभावितों के लिए हेल्पलाइन चला रहे हैं।” लेकिन विशेषज्ञ सुझाव देते हैं—बैंकिंग सिस्टम को मजबूत करें, जहां गरीबों को कम ब्याज पर लोन मिले। साथ ही, सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट्स पर सख्ती हो

किरंदुल के निवासी अब जागरूक हो रहे हैं। एक सामुदायिक समूह ने ‘नो टू बेटिंग’ कैंपेन शुरू किया है। लेकिन सवाल वही है—क्या सरकार और समाज मिलकर इस जाल को तोड़ पाएंगे, या बर्बादी का सिलसिला जारी रहेगा?

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