*दंतेवाड़ा-किरंदुल मुख्य मार्ग: निर्माण पूरा, यात्रियों को बड़ी राहत, लेकिन पुलों पर अनुमति का संकट बरकरार*

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*दंतेवाड़ा-किरंदुल मुख्य मार्ग: निर्माण पूरा, यात्रियों को बड़ी राहत, लेकिन पुलों पर अनुमति का संकट बरकरार*

 

दंतेवाड़ा, 19 अगस्त 2025: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके दंतेवाड़ा से किरंदुल तक的主 मार्ग का निर्माण आखिरकार पूरा हो गया है, जो स्थानीय निवासियों और यात्रियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। इस सड़क के बनने से अब यात्रा आसान और सुरक्षित हो गई है, खासकर बारिश के मौसम में जहां पहले की खराब सड़कें दुर्घटनाओं का कारण बनती थीं। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा सड़क के दोनों ओर लोहे की सुरक्षा रेलिंग लगाने का काम भी तेजी से चल रहा है, जो दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हालांकि, वन विभाग से अनुमति न मिलने के कारण पुलों और पुलियों का निर्माण रुका हुआ है, जो एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सूचना का अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त जानकारी के आधार पर, इस परियोजना में कई चुनौतियां सामने आई हैं। वन विभाग ने दंतेवाड़ा से किरंदुल मार्ग पर सड़क निर्माण, पुल-पुलियों और नालियों के लिए वन भूमि पर किसी भी प्रकार की अनुमति नहीं दी है। आरटीआई जवाब में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वन क्षेत्र में बिना अनुमति के कोई निर्माण कार्य नहीं हो सकता। इसके बावजूद, मुख्य सड़क का निर्माण किसी तरह पूरा हो गया, जो यात्रियों के लिए सकारात्मक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब अनुमति नहीं है, तो पुलों का निर्माण कैसे संभव होगा?

पीडब्ल्यूडी से मिली आरटीआई जानकारी के अनुसार, दंतेवाड़ा से किरंदुल तक कुल 71 पुलों का निर्माण प्रस्तावित था। वर्तमान में दंतेवाड़ा से भांसी से 3 किलोमीटर आगे कैंप तक केवल 32 पुल ही बनाए जा सके हैं। बाकी पुलों का काम वन विभाग की अनुमति न होने के कारण ठप पड़ा है। किरंदुल से भांसी तक कई पुराने पुल जर्जर हालत में हैं, जहां बारिश में पानी पुलों के ऊपर से बहता है। कई पुलों पर पैरापिट वॉल (सुरक्षा दीवार) नहीं होने से दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ये पुल न केवल यात्रा को जोखिमपूर्ण बनाते हैं, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालते हैं, क्योंकि किरंदुल जैसे इलाके खनन और व्यापार के केंद्र हैं।

यह स्थिति समझ से परे है कि आखिर अनुमति में देरी या इनकार किसकी लापरवाही से हो रहा है? क्या यह वन विभाग की सख्त नीतियों का नतीजा है, या प्रशासनिक समन्वय की कमी? विशेषज्ञों का मानना है कि वन संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास परियोजनाओं के लिए समयबद्ध अनुमतियां जरूरी हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां वन क्षेत्र बड़ा है, ऐसी परियोजनाओं में वन और विकास विभागों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है। यदि अनुमति मिल जाती, तो पुलों का निर्माण पूरा होकर यात्रा और सुरक्षित हो सकती थी।

फिर भी, इस पूरी कहानी में सकारात्मक पहलू यह है कि मुख्य सड़क का निर्माण हो चुका है, जो लंबे समय से लंबित मांग थी। यात्रियों के लिए यह बड़ी राहत है, क्योंकि अब दूरी कम समय में तय हो सकेगी। पीडब्ल्यूडी का सुरक्षा रेलिंग लगाने का कदम सराहनीय है, जो पहाड़ी इलाकों में दुर्घटनाओं को कम करेगा। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे वन विभाग से अनुमति के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं, और जल्द ही पुलों का काम शुरू होने की उम्मीद है।

यह खबर दर्शाती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है। यात्रियों की राहत के साथ-साथ, प्रशासन को पुलों की समस्या का शीघ्र समाधान करना चाहिए, ताकि यह मार्ग पूरी तरह से सुरक्षित और उपयोगी बन सके। स्थानीय समुदाय उम्मीद कर रहा है कि जल्द ही सभी मुद्दे सुलझ जाएंगे।

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