*नेक कार्य, नेक सोच: अनोखी सोच ने निभाया मानवता का फर्ज, निर्धन परिवार के लिए कराया अंतिम संस्कार*

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*नेक कार्य, नेक सोच: अनोखी सोच ने निभाया मानवता का फर्ज, निर्धन परिवार के लिए कराया अंतिम संस्कार*

दुर्ग, 10 जुलाई 2025: सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करने वाली संस्था ‘अनोखी सोच’ ने एक बार फिर अपनी करुणा और दयालुता का परिचय दिया। संस्था ने महामाया पारा निवासी 32 वर्षीय बंटी कश्यप के असामयिक निधन के बाद उनके अति निर्धन और असहाय परिवार की मदद कर अंतिम संस्कार का पुनीत कार्य संपन्न कराया। बंटी की मृत्यु बीती रात पानी में डूबने से हुई थी, और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि वे अंतिम संस्कार का खर्च भी वहन नहीं कर सकते थे।

बंटी के परिवार की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उनके पिता स्वर्गीय देवानंद कश्यप का निधन दो माह पूर्व ही हुआ था। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी अब 10 वर्षीय आदित्य के कंधों पर है, जिसने न केवल अपने दादा और पिता को मुखाग्नि दी, बल्कि अपने चाचा बंटी को भी अंतिम विदाई दी। इस मार्मिक दृश्य ने उपस्थित सभी के दिलों को झकझोर दिया।’

अनोखी सोच’ के अध्यक्ष सूर्यप्रकाश साहू को बंटी की भाभी ने संपर्क कर मदद मांगी। सूर्यप्रकाश और उनकी टीम ने तत्काल सक्रियता दिखाते हुए शंकरघाट स्थित मुक्तिधाम में पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। संस्था के सदस्यों ने आवश्यक सामग्री जुटाकर इस कार्य को संवेदनशीलता के साथ संपन्न किया। इस नेक कार्य में पंकज चौधरी, मोती ताम्रकार, राकेश शुक्ला, विजय बंसल, चंद्रप्रताप सिंह, भोला रक्सेल सहित कई अन्य सदस्यों ने सक्रिय योगदान दिया।

*आदित्य के लिए उठाया जिम्मेदारी का बीड़ा*

‘अनोखी सोच’ ने केवल अंतिम संस्कार तक ही अपनी जिम्मेदारी सीमित नहीं रखी। संस्था ने वचन दिया है कि वे आदित्य और उसके परिवार के भविष्य को संवारने में हर संभव मदद करेंगे। इस परिवार की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संस्था आगे भी तत्पर रहेगी।

*मानवता की मिसाल*

‘अनोखी सोच’ का यह प्रयास न केवल एक परिवार की मदद का प्रतीक है, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और एकजुटता का संदेश भी देता है। इस कार्य ने यह साबित किया कि छोटे-छोटे प्रयासों से भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। समाज के लिए यह एक प्रेरणा है कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनकर हम मानवता को जीवित रख सकते हैं।संस्था के इस कार्य को समाज ने सराहा और इसे एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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