*उत्कल समाज किरंदुल द्वारा उड़ीसा स्थापना दिवस (उत्कल दिवस) धूमधाम से मनाया गया*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), 1 अप्रैल 2026: लौह नगरी किरंदुल में उत्कल समाज ने उड़ीसा राज्य स्थापना दिवस (उत्कल दिवस) बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया। 1 अप्रैल 1936 को भाषाई आधार पर बिहार-उड़ीसा प्रांत से अलग होकर उड़ीसा (अब ओडिशा) राज्य की स्थापना हुई थी। इस ऐतिहासिक अवसर पर समाज के सदस्यों ने महापुरुषों को श्रद्धांजलि दी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से ओडिया संस्कृति को जीवंत रखा।
नन्हे बच्चों ने मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। नृत्य, गान और पारंपरिक ओडिया कार्यक्रमों से पूरा माहौल उत्सवपूर्ण हो गया। उत्कल समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि दूर छत्तीसगढ़ में रहते हुए भी हम अपनी जड़ों और भाषा-संस्कृति से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं।
*उड़ीसा राज्य स्थापना के प्रमुख योगदानकर्ता*
इस राज्य की स्थापना में कई महापुरुषों का अहम योगदान रहा, जिन्होंने लंबे संघर्ष के बाद ओडिया भाषी क्षेत्रों को एक अलग प्रशासनिक इकाई दिलाई। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
उत्कल गौरव मधुसूदन दास — आंदोलन के प्रमुख नेता
उत्कलमणि गोपबंधु दास — शिक्षा और राष्ट्रवादी प्रयासों के प्रणेता
फकीर मोहन सेनापति — प्रसिद्ध साहित्यकार और समाज सुधारक
महाराजा श्रीराम चंद्र भंज देव
महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति
इन महानुभावों के अथक प्रयासों से 1 अप्रैल 1936 को उड़ीसा एक अलग प्रांत बना, जो भारत में भाषाई आधार पर बने पहले राज्य के रूप में जाना जाता है।
*उत्कल समाज किरंदुल की सांस्कृतिक गतिविधियां*
उत्कल समाज किरंदुल न केवल स्थापना दिवस बल्कि श्री जगन्नाथ रथ यात्रा जैसी पारंपरिक आयोजनों में भी सक्रिय रहता है। किरंदुल में जगन्नाथ सेवा समिति और उत्कल समाज द्वारा आयोजित रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की भव्य झांकी निकाली जाती है। रथ यात्रा के दौरान पूरा इलाका पुरी जैसा वातावरण बन जाता है — भक्ति गान, संकीर्तन और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जाती है।
ये आयोजन न केवल धार्मिक हैं, बल्कि ओडिया समुदाय को एकजुट रखने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किरंदुल जैसे औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले ओडिया परिवारों के लिए उत्कल समाज एक सांस्कृतिक पुल का काम करता है।
*समुदाय का संदेश*
उत्कल समाज के सदस्यों ने इस अवसर पर संकल्प लिया कि वे ओडिशा की समृद्ध विरासत — भाषा, साहित्य, नृत्य, संगीत और भक्ति परंपरा — को आगे बढ़ाते रहेंगे। बच्चों की भागीदारी से स्पष्ट है कि भविष्य की पीढ़ी भी अपनी पहचान को मजबूत रखेगी।
ऐसे आयोजन दूर-दराज के क्षेत्रों में भी ओडिया गौरव को जीवंत रखते हैं और भारत की सांस्कृतिक विविधता को मजबूत बनाते हैं।
जय जगन्नाथ! जय उत्कल!
उत्कल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

