बौद्ध समाज में महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन को लेकर नई ऊर्जा और एकजुटता देखने को मिल रही है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के लोह नगर, किरंदुल में यह आंदोलन अब पहुंच चुका है, जहां भिक्खु धम्मतप जी (राष्ट्रीय संयोजक, ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम बोधगया) ने जनसंपर्क धम्म यात्रा के दौरान बौद्ध भाइयों-बहनों को इस ऐतिहासिक मुद्दे से अवगत कराया।
भिक्खु धम्मतप जी ने बताया कि बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार—जो भगवान बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति की पावन स्थली है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी—134 वर्षों से पूर्ण रूप से बौद्ध नियंत्रण में नहीं है। 1949 के बोधगया टेंपल एक्ट (BT Act) के तहत मंदिर प्रबंधन समिति में हिंदू और बौद्ध सदस्यों का मिश्रण है, जिसमें गैर-बौद्ध (ज्यादातर हिंदू) बहुमत में रहते हैं और जिला मजिस्ट्रेट अध्यक्ष होते हैं। बौद्ध समाज इसे अपनी धार्मिक स्वायत्तता पर अतिक्रमण मानता है और मांग करता है कि एक्ट रद्द हो तथा महाविहार का पूरा प्रबंधन बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए—जैसे अन्य धर्मों के प्रमुख तीर्थस्थलों का प्रबंधन उनके अनुयायियों के हाथ में होता है।
यह आंदोलन 1891 में श्रीलंका के अनागारिक धर्मपाल द्वारा शुरू हुआ था और आजादी के बाद भी कई बार उठता रहा, लेकिन 2025 से यह तेज हो गया। फरवरी 2025 में बोधगया में आमरण अनशन, धरना और देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हुए, जिसमें हजारों भिक्खु और अनुयायी शामिल हुए।
किरंदुल में आयोजित सभा में भिक्खु धम्मतप जी ने बताया कि आंदोलन का एक वर्ष पूर्ण होने पर 1 फरवरी से 12 फरवरी तक बोधगया में विशाल धरना और माघ पूर्णिमा महोत्सव आयोजित होगा। इसकी तैयारी के लिए यह धम्म यात्रा चल रही है।
स्थानीय बौद्ध समाज ने इस पर गहरा प्रभाव व्यक्त किया। 134 साल से मुक्ति न मिलने की बात सुनकर वे स्तब्ध रह गए और तुरंत सक्रिय हुए। उन्होंने फैसला किया कि:
हजारों पत्र लिखकर माननीय कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेजेंगे, जिसमें BT Act रद्द करने और महाविहार मुक्ति की मांग होगी।
1 फरवरी को सैकड़ों की संख्या में बोधगया पहुंचकर धरना आंदोलन में भाग लेंगे।
यह घटना दर्शाती है कि महाबोधि मुक्ति आंदोलन अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, लद्दाख, दिल्ली सहित पूरे देश और विदेश में फैल चुका है। बौद्ध समाज एकजुट होकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी धार्मिक विरासत की रक्षा के लिए संघर्षरत है।
यह यात्रा और स्थानीय समर्थन आंदोलन को नई ताकत देगा, और उम्मीद है कि सरकार जल्द इस ऐतिहासिक अन्याय को दूर करेगी। जय भीम! जय बुद्ध!

