*दंतेवाड़ा: चार साल से स्कूल नहीं आए प्रधानाध्यापक, फिर भी हर महीने मिल रहा पूरा वेतन* *संकुल समन्वयक सोनाराम कोर्राम पर गंभीर सवाल, रजिस्टर बता रहा है मिलीभगत की कहानी*

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*दंतेवाड़ा: चार साल से स्कूल नहीं आए प्रधानाध्यापक, फिर भी हर महीने मिल रहा पूरा वेतन*

*संकुल समन्वयक सोनाराम कोर्राम पर गंभीर सवाल, रजिस्टर बता रहा है मिलीभगत की कहानी*

दंतेवाड़ा/कुंवाकोंडा (छत्तीसगढ़), 8 दिसंबर 2025

बस्तर के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के कुंवाकोंडा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले बर्रेम संकुल केंद्र के प्राथमिक शाला रेवाली में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। स्कूल के प्रधान पाठक (प्रधानाध्यापक) टीकम साहू पिछले चार सालों में स्कूल में मात्र 15-20 दिन ही आए हैं, फिर भी उन्हें हर महीने पूरा वेतन मिलता रहा है। सबसे बड़ा सवाल इस पूरे खेल में संकुल समन्वयक सोनाराम कोर्राम की भूमिका पर उठ रहा है।

ग्रामीणों और सूत्रों के अनुसार, संकुल समन्वयक सोनाराम कोर्राम हफ्ते में एक बार रेवाली स्कूल का निरीक्षण करने जरूर आते हैं और निरीक्षण रजिस्टर में हस्ताक्षर भी करते हैं, लेकिन प्रधान पाठक की लगातार अनुपस्थिति की एक भी शिकायत उन्होंने न तो खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और न ही जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को अब तक की है।

*रजिस्टर खुद गवाही दे रहा है मिलीभगत की*

स्कूल के निरीक्षण रजिस्टर को देखने से साफ पता चलता है कि सोनाराम कोर्राम नियमित रूप से स्कूल आते हैं, कॉलम में टिप्पणी लिखते हैं और हस्ताक्षर करते हैं, लेकिन प्रधान पाठक की अनुपस्थिति का एक शब्द भी नहीं लिखा गया। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि “जब संकुल समन्वयक को सब कुछ पता है, फिर भी चुप्पी साधे हुए हैं तो इसका मतलब साफ है कि वेतन का बंटवारा दोनों के बीच आधा-आधा हो रहा है।”

एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “सर चार साल से स्कूल नहीं आ रहे।महीनों में एक बार आते भी हैं तो दोपहर बाद चले जाते हैं। बच्चे जंगल में लकड़ी बीनने चले जाते हैं या घर बैठे रहते हैं। संकुल वाले आते हैं, रजिस्टर में साइन करते हैं और चले जाते हैं। दोनों मिले हुए हैं।”

*चार साल, 20 दिन से भी कम उपस्थिति, फिर भी पूरा वेतन!*

सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 2021 से अब तक टीकम साहू की उपस्थिति 20 दिन से भी कम रही है। इसके बावजूद उनका वेतन हर महीने नियमित रूप से उनके खाते में जमा होता रहा। शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, संकुल समन्वयक की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने संकुल के सभी स्कूलों की उपस्थिति, शैक्षणिक गतिविधियों और अनियमितताओं पर नजर रखे और हर महीने रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजे। लेकिन बर्रेम संकुल के मामले में यह व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त दिख रही है।

*बच्चों की पढ़ाई चौपट, शिक्षक की मनमानी जारी*

रेवाली प्राथमिक शाला में करीब दर्जन भर बच्चे  नामांकित हैं। सभी बच्चे आदिवासी परिवारों से हैं। प्रधान पाठक की गैर-मौजूदगी में सहायक शिक्षक भी मनमानी करने लगे हैं। परिणामस्वरूप बच्चों का शैक्षणिक स्तर लगातार गिरता जा रहा है। पांचवीं कक्षा के कई बच्चे आज भी ठीक से हिंदी नहीं पढ़ पाते।

ग्रामीणों ने बताया कि कई बार पंचायत और ग्राम सभा में यह मुद्दा उठाया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कुछ लोगों का कहना है कि “बड़े अफसर तक बात पहुंचती ही नहीं, क्योंकि संकुल समन्वयक ही सारी रिपोर्ट दबा देता है।”

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