*छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने वाली किरंदुल की अमिट पहचान: सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल का वर्ष भर सांस्कृतिक उत्सवों का अनुपम संगम*

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*छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने वाली किरंदुल की अमिट पहचान: सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल का वर्ष भर सांस्कृतिक उत्सवों का अनुपम संगम*

किरंदुल, 22 नवंबर 2025 (सी ज़ी संविधान न्यूज़ ): छत्तीसगढ़ की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पूरे राज्य में सांस्कृतिक उल्लास का दौर चल रहा है। इस बीच, दक्षिण बस्तर के हृदय स्थल किरंदुल में स्थित छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल ने एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत कर दिया है। यह मंडल न केवल छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का जीता-जागता प्रतीक है, बल्कि वर्ष भर चलने वाले उत्सवों, पूजाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य की धरोहर को सहेजने का अनुपम कार्य कर रहा है। मंडल द्वारा आयोजित होने वाले छत्तीसगढ़ मिलन समारोह ने न केवल स्थानीय निवासियों को एकजुट किया है, बल्कि एनएमडीसी जैसे औद्योगिक संस्थानों के सहयोग से यह क्षेत्रीय संस्कृति को राष्ट्रीय पटल पर भी चमका रहा है।

*मंडल की ऐतिहासिक यात्रा: छत्तीसगढ़ की धड़कन को संजोते हुए*

छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल, किरंदुल की स्थापना राज्य निर्माण से 32  पहले हुई थी। किरंदुल, जो बस्तर जिले का एक महत्वपूर्ण खनिज-समृद्ध क्षेत्र है, यहां एनएमडीसी के लौह अयस्क खदानों के कारण औद्योगिक विकास तो हुआ, लेकिन सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का दायित्व इस मंडल ने उठाया। मंडल के संस्थापक सदस्यों ने 1 नवंबर 2000 को राज्योत्सव के अवसर पर  मिलन समारोह आयोजित किया था, जो तब से हर वर्ष धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह मंडल न केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है, बल्कि क्रीड़ा गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को भी जोड़ता है।

पिछले कई वर्षों में मंडल ने छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति—जैसे गोंड, बैगा, हल्बा और कमर समुदायों की परंपराओं—को जीवंत रखा है। लोकगीतों जैसे पंथी, राउत, करमा, सुआ और धनकुल के माध्यम से यह मंडल आदिवासी नृत्यों और कथाओं को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करता है। मंडल के अनुसार, किरंदुल जैसे दूरस्थ क्षेत्र में रहने वाले हजारों प्रवासी छत्तीसगढ़ी परिवारों के लिए यह मंडल एक सांस्कृतिक पुल का काम करता है। एनएमडीसी के सहयोग से मंडल ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि बस्तर दशहरा जैसे राज्य स्तरीय उत्सवों में भी भागीदारी की है, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करता है।

*वर्ष भर सांस्कृतिक उत्सवों का कैलेंडर: तीज-तयोहारों की अनोखी झलक*

मंडल का सबसे बड़ा योगदान है छत्तीसगढ़ के हर तीज-तयोहार को जीवंत रूप से मनाना। वर्ष भर चलने वाले इन कार्यक्रमों में पूजा, लोकनृत्य, संगीत और नाट्य का संगम होता है, जो स्थानीय समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

बस्तर दशहरा और स्थानीय दशहरा उत्सव: मंडल द्वारा दशहरा का आयोजन वर्षों से किया जा रहा है, जो बस्तर की 75 दिवसीय परंपरा से प्रेरित है। इस वर्ष अक्टूबर में आयोजित दशहरा में रंग-बिरंगे रथ, देवी-देवताओं की पूजा और लोकनृत्यों ने हजारों दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। मंडल के सदस्यों ने बताया कि यह उत्सव न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है, जहां जनजातीय कलाकारों को मंच प्रदान किया जाता है।

दीपावली और छठ पूजा: नवंबर की शुरुआत में दीपावली पर मंडल ने घर-घर दीपक जलाने के साथ-साथ सांस्कृतिक मेला लगाया,। छठ पूजा में सूर्य उपासना के साथ छत्तीसगढ़ी भक्ति गीतों की धुन पर नृत्य ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।

होली और फागुनोत्सव: मार्च-अप्रैल में होली पर ‘फाग’ गीतों और रंगों की होली के साथ मंडल ने सामुदायिक होलिका दहन किया । यह उत्सव प्रेम और सामंजस्य का प्रतीक बनता है, जहां युवा कलाकारों को प्रोत्साहित किया जाता है।

करमा और तीज त्योहार: वर्षा ऋतु में करमा पूजा पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों की प्रस्तुति मंडल का विशेष आकर्षण है। इसके अलावा, तीज जैसे हरेली, तीजा और पोला पर किसान संस्कृति को समर्पित कार्यक्रम होते हैं, जो बांस-लकड़ी की शिल्पकलाओं और गोदना कला को प्रदर्शित करते हैं।

इन सभी कार्यक्रमों में मंडल क्रीड़ा गतिविधियों को भी जोड़ता है, जैसे लोक नृत्य प्रतियोगिताएं और खेलकूद, जो युवाओं को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हैं। मंडल के सचिव ने बताया, “हमारा उद्देश्य है कि छत्तीसगढ़ की धरोहर खो न जाए। हर उत्सव में हम 50 से अधिक स्थानीय कलाकारों को मंच देते हैं, जो राज्य की सांस्कृतिक नीति के अनुरूप है।”

*आगामी छत्तीसगढ़ मिलन समारोह: अलका परगनिहा चंद्राकर का सांस्कृतिक जादू*

इस वर्ष का मुख्य आकर्षण 23 नवंबर 2025, रविवार को होने वाला छत्तीसगढ़ मिलन समारोह है, जो छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस और एनएमडीसी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित हो रहा है। लोकगीत, छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल, किरंदुल के तत्वाधान में रायपुर के फुलवारी लोककला मंच की रंगारंग प्रस्तुति होगी।

मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ी फिल्मों की नंबर वन पार्श्वगायिका और सुप्रसिद्ध लोकगीत एवं जसगीत गायिका अलका परगनिहा चंद्राकर अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरेंगी। अलका, जो छत्तीसगढ़ी संगीत जगत की मलिका हैं, ने ‘चमके रे बिंदिया’ जैसे सुपरहिट गीतों से लाखों दिलों पर राज किया है। उनके गीतों में लोक, भक्ति और रोमांटिक भावनाओं का अनोखा मिश्रण है। रायगढ़, मैनपाट महोत्सव और अन्य स्थानों पर उनकी प्रस्तुतियां हमेशा सुपरहिट रही हैं। कार्यक्रम सायं 7 बजे से के.आर.सी. शॉपिंग सेंटर के पास, किरंदुल में शुरू होगा, जहां छत्तीसगढ़ी लोकगीत, जसगीत, सुआ नृत्य और फिल्मी धुनों पर आधारित प्रस्तुतियां होंगी।

मंडल के आयोजकों के अनुसार, यह समारोह न केवल सांस्कृतिक होगा, बल्कि राज्य के 25 वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित  होगी।, और स्थानीय निवासियों से बड़ी संख्या में उपस्थिति की अपील की गई है।

*निष्कर्ष: सांस्कृतिक संरक्षण की प्रेरणा*

छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा मंडल, किरंदुल न केवल एक संस्था है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिबिंब है। वर्ष भर के इन उत्सवों और पूजाओं के माध्यम से मंडल ने साबित किया है कि आधुनिकता के दौर में भी परंपराएं जीवित रह सकती हैं। जैसे-जैसे राज्य 25वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रहा है, किरंदुल जैसे क्षेत्रों से निकलने वाली यह सांस्कृतिक लहर पूरे छत्तीसगढ़ को प्रेरित कर रही है। आगामी समारोह निश्चित रूप से अलका चंद्राकर के सुरों से सराबोर होकर एक अविस्मरणीय स्मृति बनेगा।

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