*छत्तीसगढ़ की ‘सबसे
धनी’ नगरपालिका किरंदुल: धन की चकाचौंध में बाजार की बुनियादी सड़ांध, 20 साल पुराना करोड़ों का हाट वीरान पड़ा*
किरंदुल (दंतेवाड़ा), 18 नवंबर 2025: छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में बसे किरंदुल कस्बे को ‘लौह नगरी’ के नाम से जाना जाता है। यहां राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) की विशाल लौह अयस्क खदानों ने न केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक गढ़ा है, बल्कि स्थानीय नगरपालिका को भी राज्य की ‘सबसे धनी’ नगर निकायों की सूची में शुमार कर दिया है। एनएमडीसी से आने वाले राजस्व, कर संग्रह और खनन रॉयल्टी के बल पर किरंदुल नगरपालिका का वार्षिक बजट अन्य छोटे शहरों से कहीं अधिक है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे छिपी है एक अजब-गजब की कहानी—जिसमें करोड़ों रुपये की योजनाएं वीरान पड़ी सड़ रही हैं, जबकि बढ़ती जनसंख्या और व्यापारिक भीड़ के बीच मुख्य बाजार अब खतरे की घंटी बजाने लगा है। जगह की तंगी से हाट बाजार सड़क पर सिमट गया है, जहां भारी वाहनों की आवाजाही किसी बड़े हादसे का संकेत दे रही है। स्थानीय व्यापारी दो गुटों में बंट चुके हैं, और आसपास के ग्रामीणों को रोड पर ठेले लगाने को मजबूर होना पड़ रहा है। क्या यह धन की अकड़ है या विकास की लापरवाही? किरंदुल की यह कथा न केवल स्थानीय मुद्दा है, बल्कि पूरे राज्य के शहरीकरण मॉडल पर सवाल खड़े करती है।
*एनएमडीसी की छत्रछाया में ‘धनी’ नगरपालिका: आंकड़ों की सच्चाई*
किरंदुल, दंतेवाड़ा जिले का एक छोटा सा कस्बा, रायपुर से करीब 400 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहां एनएमडीसी की बैलाडीला खदानें देश की लौह अयस्क उत्पादन का प्रमुख केंद्र हैं। 2023-24 में एनएमडीसी का राजस्व 21,294 करोड़ रुपये रहा, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकार को रॉयल्टी और कर के रूप में जाता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने 2022-23 में ही खनिज राजस्व से रिकॉर्ड 12,941 करोड़ रुपये कमाए, जिसमें लौह अयस्क का योगदान सबसे अधिक (3,607 करोड़) था। किरंदुल नगरपालिका इसी पूल से लाभान्वित होती है—एनएमडीसी के कर्मचारियों की बसाहट, टैक्स संग्रह और कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड्स से इसका बजट मोटा है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, नगरपालिका का वार्षिक राजस्व 50 करोड़ से ऊपर है, जो राज्य के कई बड़े शहरों से ज्यादा है। लेकिन सवाल यह है कि यह धन कहां जा रहा है? सड़कें, जल निकासी और बाजार जैसी बुनियादी सुविधाओं की हालत देखकर लगता है, जैसे विकास की प्राथमिकताएं उलट-पुलट हो गई हों।
नगरपालिका के आधिकारिक रिकॉर्ड्स में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन स्थानीय निवासियों का कहना है कि एनएमडीसी से आने वाला ‘माइनिंग टैक्स’ और संपत्ति कर ही इसे ‘सबसे धनी’ बनाते हैं। दंतेवाड़ा प्रशासन ने हाल ही में एनएमडीसी पर 1,620 करोड़ का जुर्माना लगाया था, जो खनन नियमों के उल्लंघन से जुड़ा था। यह जुर्माना अगर नगरपालिका तक पहुंचा, तो इसका असर विकास योजनाओं पर पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल, धन की उपलब्धता के बावजूद, किरंदुल के बाजार विकास की कगार पर लटक रहे हैं।
20 साल पुराना ‘सफेद हाथी’: गांधीनगर हाट बाजार की वीरानी
किरंदुल की कहानी का सबसे बड़ा उदाहरण है 20 साल पहले बना गांधीनगर हाट बाजार। लगभग 1 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से निर्मित यह बाजार स्थानीय व्यापारियों के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाला था। 2005 के आसपास शुरू हुई यह परियोजना एनएमडीसी के सीएसआर फंड्स से वित्त पोषित थी, जिसमें आधुनिक शेड, स्टॉल और पार्किंग सुविधाएं शामिल थीं। उद्देश्य था—आसपास के 50 से अधिक गांवों के ग्रामीणों को एक छत के नीचे व्यापार का मौका देना, ताकि हाट बाजार साप्ताहिक आय का स्रोत बने।
लेकिन आज यह बाजार वीरान पड़ा सड़ रहा है। जंग लगे गेट, टूटे शेड और घास-फूस से ढके स्टॉल—यह दृश्य किसी भूले-बिसरे सपने जैसा है। स्थानीय व्यापारी बताते हैं कि निर्माण के बाद प्रचार-प्रसार की कमी, रखरखाव का अभाव और दूरी (मुख्य बाजार से 2 किलोमीटर) ने इसे असफल बना दिया। “हमने सोचा था कि यहां शिफ्ट हो जाएंगे, लेकिन बिजली, पानी और सड़क की समस्या ने सब बर्बाद कर दिया,” कहते हैं बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ के एक वरिष्ठ सदस्य। संघ, जो 56 साल पुराना है, ने कई बार नगरपालिका से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हाल के वर्षों में एनएमडीसी ने सीएसआर के तहत बाजार सुधार के प्रयास किए, जैसे 2020 में आगजनी के बाद अस्थायी हाट में मास्क वितरण। लेकिन स्थायी समाधान नहीं। 2020 में आग लगने के बाद एसडीएम ने व्यापारियों को नए हाट में शिफ्ट कराया था, लेकिन मामला अब भी लंबित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘सफेद हाथी’ (अनुपयोगी परियोजना) विकास मॉडल की नाकामी का प्रतीक है, जहां योजना तो भव्य होती है, लेकिन ग्राउंड लेवल पर निगरानी का अभाव सब बर्बाद कर देता है।
*मुख्य बाजार की तंगी: सड़क पर हाट, दुर्घटना का खतरा*
दूसरी तरफ, किरंदुल का मुख्य बाजार—जो दशकों पुराना है—अब जनसंख्या विस्फोट का शिकार हो गया है। एनएमडीसी की खदानों से जुड़े हजारों मजदूरों की बसाहट ने कस्बे की आबादी को दोगुना कर दिया है। अनुमान है कि किरंदुल की जनसंख्या अब 25,000 से ऊपर है, जिसमें बाहरी मजदूरों का बड़ा हिस्सा शामिल है। लेकिन बाजार का विस्तार नहीं हुआ। हाट बाजार, जो हफ्ते में दो दिन (बुधवार और रविवार) लगता है, अब जगह की कमी से मुख्य मार्ग पर सिमट गया है।
यह मार्ग एनएमडीसी की खदानों से जुड़ा है, जहां 14 चक्का ट्रेलर, ओवरलोड डंपर और भारी वाहन लगातार चढ़ाई चढ़ते-उतरते हैं। “ट्रेलर की रफ्तार और ठेलों की भीड़—कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सड़क पर ही खरीदारी करते हैं,” बताते हैं एक स्थानीय दुकानदार। हाल के महीनों में छोटी-मोटी दुर्घटनाएं बढ़ी हैं, जैसे वाहन ठेलों से टकराना। नगरपालिका की ‘अकड़’ का आरोप लगाते हुए व्यापारी कहते हैं कि अधिकारी इंतजार कर रहे हैं किसी बड़े हादसे के, तभी जागेंगे।
2024 में एनएमडीसी के किरंदुल कॉम्प्लेक्स में एक निर्माण स्थल पर चट्टान गिरने से हादसा हुआ था, जिसमें मजदूर घायल हुए यह घटना बाजार क्षेत्र के करीब थी, जिसने स्थानीयों में भय पैदा कर दिया। लेकिन बाजार विस्तार पर कोई ठोस कदम नहीं।
*व्यापारियों का विभाजन: पुरानी संस्था बनाम नई चैंबर*
किरंदुल के व्यापारी अब दो खेमों में बंट चुके हैं, जो समस्या को और जटिल बना रहा है। एक तरफ है 56 साल पुराना बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ, जो पारंपरिक व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करता है। संघ ने कई बार हाट बाजार को पुनर्जीवित करने की मांग की है, लेकिन नगरपालिका से टकराव बढ़ा है। दूसरी ओर, हाल ही में बनी किरंदुल चैंबर ऑफ कॉमर्स—जो कुछ युवा और नए व्यापारियों का समूह है—अलग रास्ता अपना रही है। चैंबर का दावा है कि वह आधुनिक सुविधाओं पर जोर देगी, लेकिन आलोचक इसे ‘विभाजनकारी’ मानते हैं।
“पुरानी संस्था का अनुभव है, लेकिन नई को एनएमडीसी से सीधा संपर्क चाहिए,” कहते हैं एक चैंबर सदस्य। इस विभाजन से आसपास के 50 गांवों के ग्रामीण व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। वे रोड पर दुकान लगाने को मजबूर हैं, जहां पुलिस की सख्ती और मौसम की मार झेलनी पड़ती है। 2022 में मुख्यमंत्री हाट-बाजार क्लिनिक योजना के तहत किरंदुल में स्वास्थ्य शिविर लगे थे, लेकिन व्यापारिक सुविधाओं पर ध्यान कम।
*विश्लेषण: धन है, इच्छाशक्ति की कमी क्यों?*
विशेषज्ञों के अनुसार, किरंदुल की समस्या शहरीकरण की असमानता का प्रतिबिंब है। एनएमडीसी जैसी सार्वजनिक कंपनियां सीएसआर में निवेश करती हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन की निगरानी कमजोर है। राज्य स्तर पर छत्तीसगढ़ का खनिज राजस्व बढ़ रहा है—2025 में 15,000 करोड़ का लक्ष्य है—लेकिन छोटे कस्बों तक पहुंच सीमित। नगरपालिका परिषद अधिनियम के तहत बाजार विकास अनिवार्य है, लेकिन किरंदुल में प्रोजेक्ट्स लटके पड़े हैं। राजनीतिक अस्थिरता—जैसे 2023 में बीजेपी सरकार के आने के बाद खनन परियोजनाओं का पुनरारंभ—ने स्थानीय मुद्दों को पीछे धकेल दिया।
स्थानीय विधायक और जिला प्रशासन से संपर्क करने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। लेकिन व्यापारियों का कहना है कि एक संयुक्त समिति गठित हो, जिसमें एनएमडीसी, नगरपालिका और दोनों संघ शामिल हों। “धन तो है, बस सही दिशा चाहिए,” यह उनकी एकमत मांग है।
*उम्मीद की किरण: क्या बदलेगा भविष्य?*
किरंदुल जैसे कस्बे राज्य के विकास मॉडल का आईना हैं। एनएमडीसी 2025-26 में 70,000 करोड़ के कैपेक्स प्लान में छत्तीसगढ़ को बड़ा हिस्सा देगी, जिसमें किरंदुल की रेल लाइन विस्तार शामिल है अगर इसका कुछ हिस्सा बाजार विकास में लगे, तो गांधीनगर हाट फिर जीवंत हो सकता है। लेकिन तब तक, सड़क पर लगने वाला हाट बाजार खतरे की घंटी बजाता रहेगा। स्थानीय निवासी उम्मीद करते हैं कि कोई बड़ा हादसा न हो, और नगरपालिका अपनी ‘अकड़’ छोड़कर कार्रवाई करे। अन्यथा, ‘सबसे धनी’ का तमगा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।

