*किरंदुल में दीप दान उत्सव की धूम: सम्राट अशोक विजय उत्सव के रूप में बौद्ध समाज का ऐतिहासिक जश्न*

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*किरंदुल में दीप दान उत्सव की धूम: सम्राट अशोक विजय उत्सव के रूप में बौद्ध समाज का ऐतिहासिक जश्न*

 

किरंदुल, छत्तीसगढ़, 20 अक्टूबर 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के खनिज समृद्ध किरंदुल शहर में आज बौद्ध समाज ने दीप दान उत्सव को भव्य रूप से मनाया। बौद्ध समाज विकास समिति किरंदुल और नागार्जुन बुद्ध विहार एवं विकास समिति की ओर से आयोजित इस उत्सव को ‘सम्राट अशोक विजय उत्सव’ के रूप में मनाया गया, जो न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक है, बल्कि बौद्ध इतिहास की गौरवपूर्ण स्मृति को जीवंत करने का माध्यम भी बना। कार्तिक अमावस्या के पावन अवसर पर हजारों उपासक-उपासिकाओं ने दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश दिया, जो सम्राट अशोक की धम्म विजय से प्रेरित है।

समिति के द्वारा प्रतिवर्ष नागार्जुन बुद्ध विहार किरंदुल मे सामाजिक उत्सव के रूप मे मनाया जाता है यह उत्सव प्राचीन बौद्ध परंपरा का हिस्सा है, जिसमें दीप दान के माध्यम से ज्ञान की ज्योति फैलाई जाती है। “सभी उपासक एवं उपासिकाओं को सप्रेम जय भीम, नमो बुद्धाय। आप सभी को नागार्जुन बुद्ध विहार एवं विकास समिति किरंदुल की ओर से दीप दान उत्सव (सम्राट अशोक विजय उत्सव) दिन के अशेष बधाई एवं शुभकामनाएं,” यह संदेश शहर भर में गूंजा। कार्यक्रम की शुरुआत बुद्ध वंदना से हुई, उसके बाद समिति सदस्यों ने दीप प्रज्वलित कर अशोक स्तंभ की प्रतिकृति का अनावरण किया। स्थानीय विहार परिसर को हजारों दीयों से सजाया गया, जो रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठा।

*सम्राट अशोक की विजय: इतिहास का एक पन्ना*

दीप दान उत्सव का विश्लेषण करें तो यह महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक परिवर्तन की साक्षी है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की भयावहता से व्यथित होकर बौद्ध धम्म अपनाया था। इस विजय को ‘धम्म विजय’ कहा गया, जो हिंसा के बजाय अहिंसा और करुणा पर आधारित था। बौद्ध ग्रंथों और इतिहासकारों के अनुसार, अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए 84,000 स्तूपों, विहारों और चैत्यों का निर्माण कराया। इनके उद्घाटन पर कार्तिक अमावस्या के दिन पूरे साम्राज्य में दीपोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें दीप जलाकर भिक्षुओं को दान दिया जाता था। यह ‘दीप दान उत्सव’ का उद्गम बिंदु माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह उत्सव भगवान बुद्ध के अंतिम उपदेश “अत्ता दीपो भव” (स्वयं अपना दीपक बनो) से प्रेरित है, जहां दीप अज्ञान के अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी नव-बौद्ध आंदोलन में इसकी पुनर्स्थापना पर जोर दिया, इसे अशोक की विरासत से जोड़ते हुए। किरंदुल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में यह उत्सव बहुजन समाज के सशक्तिकरण का माध्यम बन रहा है, जहां बौद्ध अनुयायी अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर रहे हैं। हालांकि, कुछ इतिहासकारों द्वारा इसकी प्राचीनता पर सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन बौद्ध साहित्य में अशोक के दान और दीपोत्सव का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।

*किरंदुल में उत्सव का भव्य स्वरूप: सांस्कृतिक मिश्रण*

किरंदुल, जो लौह अयस्क खदानों के लिए जाना जाता है, में बौद्ध समुदाय की सक्रियता ने इस उत्सव को स्थानीय रंग दे दिया। नागार्जुन बुद्ध विहार परिसर में शाम को दीपावली की तरह घर-घर दीप जलाए गए, लेकिन बौद्ध मंत्रों के साथ, जो उत्सव को अनूठा बनाता है।

सामाजिक प्रभाव: एकता और जागरूकता का संदेश

विश्लेषण में यह स्पष्ट होता है कि दीप दान उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान का साधन है। नव-बौद्ध समुदाय में यह पर्व जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। डॉ. आंबेडकर के अनुयायी इसे ‘अशोक विजय’ के रूप में मनाते हैं। किरंदुल में आयोजित इस उत्सव ने स्थानीय गैर-बौद्ध समुदाय को भी आकर्षित किया, जहां संयुक्त पाठ का आयोजन हुआ। पर्यावरणविदों ने बताया कि दीप जलाने की यह परंपरा ऊर्जा संरक्षण पर भी जोर देती है, क्योंकि पारंपरिक मिट्टी के दीये उपयोग किए जाते हैं।

आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बौद्ध आबादी करीब 1.5 लाख है, और ऐसे उत्सवों ने समुदाय को मजबूत बनाया है। भविष्य में, समिति ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए इसे वैश्विक स्तर पर फैलाने की योजना बना रही है। यह उत्सव न केवल अतीत की स्मृति है, बल्कि वर्तमान में शांति और विकास का आह्वान भी।

किरंदुल के इस उत्सव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बौद्ध धम्म की ज्योति आज भी प्रज्वलित है। समिति ने सभी को शुभकामनाएं देते हुए कहा, “नमो बुद्धाय! जय भीम!” यह पर्व निश्चित रूप से सामाजिक एकता का नया अध्याय लिखेगा।

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