भारत की सबसे धनी नगरपालिका किरंदुल… फिर भी कंगाल! 6740760/लाख के बिजली कर्ज़ का गुनहगार कौन?
किरंदुल। छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिकाओं में गिनी जाने वाली किरंदुल नगरपालिका परिषद आज 6740760/लाख रुपये के बिजली बिल के कर्ज़ में डूबी हुई है। सवाल यह उठता है कि आखिर वो पैसा गया कहां, जो नगर की बुनियादी सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए था?
बैंकों में कर्मचारी रखने से लेकर ठेका श्रमिकों तक—कहां बहा जनता का पैसा?
किरंदुल नगरपालिका अपनी संपन्नता के लिए जानी जाती थी। नगर पालिका द्वारा भारतीय स्टेट बैंक मे 3 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक मे 1 , बस्तर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक मे 1 और यूको बैंक में 2 कुल 7 कर्मचारी तैनात किए गए थे, जिनका वेतन नगरपालिका से 6000रु प्रति माह दिया जाता था। लेकिन क्या यह सही था? क्या सरकारी और निजी बैंक अपने ग्राहकों की संतुष्टि के लिए खुद सक्षम नहीं थे या अब भी हैं और हैं तो ऐसे में नगरपालिका द्वारा कर्मचारी का सहयोग क्यों ?
इसके अलावा, कुछ पूर्व पार्षदों के परिजनों को भी ठेका श्रमिक के रूप में नियुक्त कर ₹6000 प्रति माह का भुगतान किया जाता था, भले ही उनमें से कई ने नगरपालिका का चेहरा तक न देखा हो।
कर्मचारी पालिका बनती गई नगरपालिका!
2024 के मार्च-अप्रैल और उसके बाद के महीनों में, किरंदुल नगरपालिका के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुख्य अधिकारी और अन्य कर्मचारियों के कमरों के दरवाजों पर महिला ठेका श्रमिक कुर्सियों पर बिना काम के बैठी नजर आती थीं और कमरे के अंदर भी इतने ठेकाश्रमिक महिला कर्मचारी थे की कोई बाहरी व्यक्ति किसी कार्य के लिऐ नगरपालिका में गया तो बैठने को कुर्सी खाली नहीं मिलती थी सिर्फ नगर अध्यक्ष व मुख्य नगरपालिका अधिकारी के कमरे में कुर्सी खाली मिलती थी । उन दिनों ऐसा लगता था मानो यह नगरपालिका नहीं, बल्कि ‘कर्मचारी पालिका’ बन गई हो।
सुविधाओं की बदहाली और वित्तीय अनियमितताएँ!
आज नगर में जल आपूर्ति के लिए पहले मौजूद 2 बड़े और 10 छोटे पानी टैंकरों में से केवल 1 बड़ा और 2 छोटे टैंकर ही बचे हैं। क्या इनके रखरखाव का पैसा ठेका श्रमिकों के वेतन में चला गया?
नगरपालिका को हर महीने एन एम डी सी से ₹4,96,000 की राशि मिलती थी, जो सफाई कार्यों में खर्च होनी थी। फिर भी, शहर गंदगी, जल संकट और अतिक्रमण जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। मुख्य बाजार का प्रवेश द्वार अतिक्रमण की चपेट में है, जहां पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।
6740760/ लाख के बिजली कर्ज़ का जिम्मेदार कौन?
आज जब नगर पर 6740760/ लाख रुपये का बिजली बिल बकाया है, तो यह सवाल उठता है कि नगरपालिका में बैठे अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अधिकारी और पूर्व जनप्रतिनिधि क्यों चुप रहे?
नगरपालिका में वर्षों तक रह चुके 5 बार के पार्षद व पूर्व उपाध्यक्ष, 2 बार के पार्षद व एक बार के निर्दलीय अध्यक्ष, 4 बार के पार्षद सहित कई जनप्रतिनिधियों ने क्यों नहीं आवाज़ उठाई?
क्या नगरपालिका में बैठे ये सभी जनप्रतिनिधि और अधिकारी किसी डर के कारण चुप थे, या यह कहना गलत नहीं होगा कि धनी नगरपालिका को कंगाल करने में सबने अपनी-अपनी अहम भूमिका निभाई?
सत्ता परिवर्तन के तत्काल बाद खुलाशा होना की 74 लाख रु का विद्युत् भुगतान का बकाया होना पिछले कार्यकाल के जनप्रतिनिधि जो इस कार्यकाल में भी जनप्रतिनिधि के रूप में नगरपालिका में मौजूद हैं सवाल को जन्म देता हैं की विद्युत बकाया होने की जानकारी के बाद भी आवाज क्यों नहीं उठायी गयी और जानकारी नहीं थी तो अब खुलाशा कैसे हुआ
क्या नया नेतृत्व किरंदुल को उबार पाएगा?
अब जिम्मेदारी नवनिर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष रूबी सिंह के कंधों पर है। वे इन चुनौतियों का सामना कैसे करेंगी और किरंदुल को दोबारा संवारने के लिए क्या कदम उठाएंगी? यह देखने वाली बात होगी।
क्या किरंदुल की जनता को जवाब मिलेगा या मामला यूं ही ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
(यह मुद्दा केवल बिजली कर्ज़ तक सीमित नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है।)
