*किरंदुल में नाबालिगों के हाथों में दोपहिया और चारपहिया वाहनों की चाबी, आखिर जिम्मेदार कौन?दुर्ग न्यायालय के फैसले से अभिभावकों को मिला कड़ा संदेश, किरंदुल में भी नियमों की अनदेखी पर उठ रहे सवाल*
किरंदुल। सड़क सुरक्षा को लेकर पुलिस और प्रशासन लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। स्कूलों में बच्चों को यातायात नियमों की समझाइश दी जा रही है, वहीं किरंदुल पुलिस द्वारा सड़कों पर भी लगातार लोगों को जागरूक किया जा रहा है। इसके बावजूद नगर में नाबालिग बच्चों को बेधड़क दोपहिया और चारपहिया वाहन चलाते देखना आम बात होती जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन नाबालिग बच्चों के हाथों में वाहन की चाबी कौन थमा रहा है? जिन बच्चों की उम्र अभी वाहन चलाने के लिए निर्धारित कानूनी उम्र तक नहीं पहुंची है, उन्हें माता-पिता और अभिभावकों द्वारा वाहन उपलब्ध कराना न केवल उनकी जान के साथ खिलवाड़ है, बल्कि सड़क पर चलने वाले अन्य लोगों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है।
हाल ही में दुर्ग न्यायालय का एक फैसला इस मामले में अभिभावकों के लिए कड़ा संदेश बनकर सामने आया है। समाचार के अनुसार, बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के बाइक चलाते हुए सड़क दुर्घटना में एक युवक की मौत के मामले में नाबालिग बेटे को पांच साल के सश्रम कारावास और बाइक उपलब्ध कराने वाले पिता को तीन महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई। यह फैसला उन अभिभावकों के लिए चेतावनी है, जो अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति देते हैं।
किरंदुल में भी नियमों की अनदेखी कब तक?
किरंदुल के विभिन्न स्कूलों में आने-जाने वाले नाबालिग विद्यार्थियों को दोपहिया वाहन चलाते हुए देखा जा सकता है। कई बार तेज रफ्तार और बिना पर्याप्त अनुभव के वाहन चलाने से दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। सवाल यह भी है कि यदि कोई नाबालिग वाहन चालक किसी राहगीर, स्कूली विद्यार्थी या अन्य वाहन चालक को दुर्घटना का शिकार बना देता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
पुलिस द्वारा बार-बार समझाइश देने के बावजूद यदि अभिभावक ही अपने बच्चों को वाहन उपलब्ध कराते रहेंगे, तो जागरूकता अभियान का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
अभिभावक समझें अपनी जिम्मेदारी
मोटर वाहन अधिनियम में नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने और उन्हें वाहन उपलब्ध कराने वाले अभिभावकों या वाहन मालिकों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान हैं। इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को समय से पहले वाहन चलाने की छूट न दें।
अब जरूरत केवल समझाइश की नहीं, बल्कि नियमों का सख्ती से पालन कराने की भी है। स्कूलों के आसपास और नगर के प्रमुख मार्गों पर नियमित जांच होनी चाहिए तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
आखिर सवाल यही है—बच्चों के हाथों में वाहन की चाबी देकर अभिभावक अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं?
याद रखें, बच्चों को वाहन देना सुविधा नहीं, बल्कि उनकी और दूसरों की जिंदगी को जोखिम में डालना भी साबित हो सकता है।
सावधान रहें… सुरक्षित रहें।
