*मिनी इंडिया में फूट की साजिश! एनएमडीसी का विवादास्पद पत्र: किरंदुल को ‘एनएमडीसी कर्मचारी’ और ‘गैर-कर्मचारी’ में बांटने की तैयारी?*
किरंदुल (दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़) – जहां सदियों से आदिवासी, हिंदू, मुस्लिम, सिख समेत सभी जाती समुदाय भाईचारे की मिसाल पेश करते आए हैं, वहीं अब नवरत्न कंपनी एनएमडीसी के एक आंतरिक पत्र ने पूरे ‘मिनी इंडिया’ को हिला दिया है। पत्र में 14 सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों (समाज/भवनों) के नाम के आगे “एनएमडीसी कर्मचारी” उपसर्ग जोड़ने का फैसला लिया गया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि किरंदुल में एनएमडीसी द्वारा सर्वाधिक लाभ पाने वाली दो प्रमुख यूनियनों — इंटक यूनियन और एसकेएमएस यूनियन — को इस नोटिस से पूरी तरह दूर रखा गया है। क्या एनएमडीसी ने इन दोनों यूनियनों को खुली छूट दे रखी है?
पत्र का पूरा विवरण और गहरा विश्लेषण
एनएमडीसी किरंदुल परियोजना के मानव संसाधन विभाग से जारी इस पत्र में साफ लिखा है:
“सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत, संबंधित समाज/भवनों के नाम के आगे ‘एनएमडीसी कर्मचारी’ उपसर्ग जोड़ने का फैसला किया गया है। यह पहल कंपनी के कल्याणकारी उपायों और सामाजिक योगदान के बारे में कर्मचारियों तथा आम जनता में अधिक जागरूकता पैदा करेगी।”
अंतिम तिथि: 10 जुलाई 2026 तक नाम बदलकर पंजीकरण करवाना और दस्तावेज मानव संसाधन विभाग को जमा करना अनिवार्य।
प्रभाव: सभी प्रदर्शन बोर्ड, साइन बोर्ड और नामों में “एनएमडीसी कर्मचारी” जोड़ना जरूरी।
14 सामाजिक संस्थाओं पर तो तलवार चली, लेकिन इंटक और एसकेएमएस यूनियन को छूट क्यों?
किरंदुल में एनएमडीसी के सबसे बड़े लाभार्थी माने जाने वाले इन दोनों यूनियनों को इस पत्र से अलग रखा गया है। क्या यह साफ favoritism है? क्या ये दोनों यूनियन एनएमडीसी प्रबंधन की विशेष कृपा पा रही हैं, जबकि अन्य 14 संस्थाओं पर नाम बदलने का दबाव बनाया जा रहा है?
सवाल उठता है – क्या यह सिर्फ “जागरूकता” का प्रयास है या किरंदुल की एकता को तोड़ने वाली साजिश? और यूनियनों को छूट देकर कंपनी किस तरह का खेल खेल रही है?
किरंदुल में वर्षों पुराना राघव मंदिर (जो एनएमडीसी स्थापना के समय से मौजूद है) समेत कई संस्थाएं प्रभावित होंगी। क्या अब गैर-एनएमडीसी कर्मचारी या आम आदिवासी निवासी इन भवनों में प्रवेश नहीं कर पाएंगे? क्या सामाजिक आयोजनों, पूजा-पाठ या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में “केवल एनएमडीसी कर्मचारी” का बोर्ड लग जाएगा?
और भी बड़े सवाल
फ्लाईओवर ब्रिज: एनएमडीसी द्वारा निर्माणाधीन फ्लाईओवर क्या केवल कंपनी कर्मचारियों के लिए होगा? आम जनता का प्रवेश प्रतिबंधित?
विभाजन की आशंका: एक तरफ एनएमडीसी कर्मचारियों का एलीट क्षेत्र, दूसरी तरफ गैर-कर्मचारियों (जिनमें ज्यादातर आदिवासी और स्थानीय निवासी) का इलाका। क्या यह ‘मिनी इंडिया’ को ‘मिनी विभाजित भारत’ बनाने की तैयारी है?
कंपनी की सामाजिक जिम्मेदारी के नाम पर दी गई सुविधाओं को अब केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित करने की कोशिश क्यों? इंटक और एसकेएमएस को छूट देकर क्या कंपनी दोहरे मापदंड अपना रही है?
स्थानीय लोग पूछ रहे हैं – एनएमडीसी किरंदुल की प्राकृतिक संपदा (बैलाडिला लौह अयस्क) पर निर्भर है। यहां के आदिवासी और गैर-कर्मचारी भी अप्रत्यक्ष रूप से कंपनी के विकास में योगदान देते हैं। फिर ऐसा भेदभाव और चुनिंदा छूट क्यों?
किरंदुल की सांस्कृतिक विरासत पर खतरा
राघव मंदिर पूरे किरंदुल की आस्था का केंद्र है। यहां सभी समुदाय सर झुकाते हैं। एनएमडीसी के इस कदम से क्या मंदिर और आसपास की संस्थाएं भी प्रभावित होंगी? क्या भविष्य में गैर-कर्मचारियों को यहां आने से रोका जाएगा?
यह पत्र 14 सामाजिक संगठनों को सीधे प्रभावित कर रहा है, जबकि सबसे प्रभावशाली यूनियनों को बचाकर रखा गया है। अगर ये संगठन एनएमडीसी द्वारा वित्तपोषित हैं तो क्या उनका स्वतंत्र अस्तित्व खत्म हो जाएगा?
एनएमडीसी से जवाब की मांग:
14 संस्थाओं पर नाम बदलने का दबाव क्यों, जबकि इंटक और एसकेएमएस यूनियन को पूरी छूट?
क्या यह फैसला सभी हितधारकों से चर्चा के बाद लिया गया?
क्या गैर-एनएमडीसी निवासियों को इन सुविधाओं से वंचित रखने का कोई कानूनी आधार है?
सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाले इस कदम पर कंपनी क्या सफाई देगी?
किरंदुल के लोग चिंतित हैं। एक तरफ कंपनी विकास और रोजगार देती है, दूसरी तरफ ऐसे कदम स्थानीय एकता को चुनौती दे रहे हैं। क्या एनएमडीसी, जो “समाज के प्रति जिम्मेदार” होने का दावा करती है, अब खुद विभाजन की दीवार खड़ी कर रही है?
समय आ गया है कि प्रशासन, स्थानीय सांसद, विधायक और एनएमडीसी प्रबंधन इस मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लें। मिनी इंडिया की एकता टूटने नहीं दी जानी चाहिए।

