*छत्तीसगढ़: नक्सल प्रभाव मुक्त दंतेवाड़ा में शिक्षा की नई सुबह, अंतिम गांव तक पहुंची विकास की लहर*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): नक्सलवाद के खात्मे के बाद अब दंतेवाड़ा जिले में शिक्षा विभाग विकास की नई मिसाल पेश कर रहा है। जिले के सबसे दुर्गम और अंदरूनी गांवों—लावा गांव, बड़े पल्ली और बेंगपाल —में पहली बार शाला प्रवेश उत्सव मनाया गया और स्कूल शुरू हो गए। यह उन बच्चों के लिए ऐतिहासिक पल है, जिन्होंने कभी स्कूल की इमारत भी नहीं देखी थी।
लावा गांव: जहां कभी स्कूल नहीं था
लावा गांव तक पहुंचना आसान नहीं है। यहां पहुंचने के लिए जिला कलेक्टर दिवेश धुरु ने स्वयं 8 किलोमीटर का घने जंगलों वाला पहाड़ी रास्ता पैदल तय किया। ग्रामीणों की स्थिति देखकर उन्होंने तुरंत कार्रवाई की।
अब गांव में पेयजल की समस्या दूर हो गई है—दो नए कुओं की खुदाई हो चुकी है, जिससे स्वच्छ पानी उपलब्ध हो रहा है।
सड़क निर्माण जोरों पर है।
नए सत्र से स्कूल शुरू हो गया है।
गांववासी बताते हैं कि पहले बारिश का पानी तिरपाल के जरिए बर्तनों में जमा करके प्यास बुझानी पड़ती थी। आज वही गांव शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की ओर बढ़ रहा है।
बड़े पल्ली और बेंगपाल में भी विकास की गंगा
इसी तरह बड़े पल्ली और बेंगपाल जैसे पहुंच-विहीन गांवों में भी खंड शिक्षा अधिकारी, शिक्षक और अधिकारियों की टीम ने 5-7 किलोमीटर पैदल यात्रा कर शाला प्रवेश उत्सव मनाया। इन गांवों में भी स्कूल स्थापित किए गए हैं।
यह प्रयास जिले के उन दूरदराज के इलाकों तक शिक्षा पहुंचाने का हिस्सा है जहां पहले सुरक्षा कारणों से विकास कार्य लगभग ठप थे। नक्सल प्रभाव समाप्त होने के बाद प्रशासन अब अंतिम बच्चे तक शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने में जुटा हुआ है।
सकारात्मक प्रभाव
सैकड़ों बच्चे अब नियमित स्कूल जा सकेंगे।
गांवों में पानी, सड़क और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हो रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों में विकास को लेकर नई उम्मीद जगी है।
जिला कलेक्टर दिवेश धुरु के नेतृत्व में हो रहा यह प्रयास दिखाता है कि प्रशासन कितनी संवेदनशीलता और मेहनत से दूरस्थ इलाकों के विकास पर काम कर रहा है।
यह खबर उन हजारों बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कहानी है, जिनके लिए अब स्कूल की घंटी बज रही है—जंगलों के पार, पहाड़ों के ऊपर।
दंतेवाड़ा से सकारात्मक बदलाव की यह मिसाल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए प्रेरणादायक है।

