*किरंदुल की शर्मसार कर देने वाली सच्चाई: मौत के बाद भी बेबसी, और राजनेता? सिर्फ दिखावा, भाषण और खामोशी!*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), 3 जून 2026: खनिजों की भूमि, नवरत्न कंपनी एनएमडीसी की कमाई और कुबेर नगरी कहलाने वाले किरंदुल में एक मृत व्यक्ति के शव को 100 किलोमीटर से अधिक दूर ले जाने के लिए एक भी फ्रिजर युक्त मर्चरी शव वाहन नहीं मिलना अब सामान्य घटना बनती जा रही है। 30 मई की रात हुई इस हृदयविदारक घटना को कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन किरंदुल की राजनीति अभी भी सोई हुई है। न कांग्रेस, न भाजपा, न CPI, न INTUC, न SKMS — कोई भी नेता आगे नहीं आया। कोई बयान नहीं, कोई जांच नहीं, कोई दबाव नहीं।
क्या किरंदुल के राजनेता सिर्फ़ दिखावे के समाजसेवी हैं? चुनावी रैलियों में “जनता के दुख-दर्द में साथ” जैसे बड़े-बड़े नारे लगाने वाले नेता, जब असली वक्त आता है तो गायब क्यों हो जाते हैं?
घटना का पूरा दर्दनाक सच
30 मई की रात करीब 12:15 बजे किरंदुल में एक व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। परिजनों ने तुरंत एनएमडीसी किरंदुल परियोजना अस्पताल पहुंचकर फ्रिजर युक्त शव वाहन मांगा, ताकि शव को उत्तर प्रदेश ले जाया जा सके। लेकिन अस्पताल प्रबंधन का एक ही जवाब था — “ऐसा कोई वाहन उपलब्ध नहीं है।”
पूरी रात परिवार ने नर्क झेला:
*किरंदुल, बचेली, दंतेवाड़ा — कहीं कोई मर्चरी वैन नहीं मिली।*
जगदलपुर तक संपर्क किया गया, लेकिन वहां भी उचित व्यवस्था नहीं।
अस्पताल में रखे फ्रिजर को दो एंबुलेंस में लगाने की कोशिश की गई, पर दोनों के इन्वर्टर खराब निकले।
आखिरकार 5 महीने पहले कबाड़ घोषित की गई पुरानी शव वाहन दे दी गई।
सुबह 7 बजे मजबूरी में उसी खस्ताहाल वाहन में शव लेकर रवाना हुए। 70-80 किलोमीटर बाद कोड़ेनार में वाहन बीच रास्ते खराब हो गया। फिर जगदलपुर से दूसरी एंबुलेंस बुलानी पड़ी।
लगभग 7 घंटे तक गर्मी में बिना उचित संरक्षण के शव के साथ परिवार को इंतजार करना पड़ा। यह दृश्य किसी भी इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है।
*किरंदुल के राजनेताओं पर तीखा सवाल*
*इस घटना को कई दिन बीत गए, लेकिन किरंदुल की राजनीतिक जमात में सन्नाटा पसरा हुआ है।*
भाजपा के स्थानीय नेता, जो क्षेत्र में विकास का दावा करते हैं, इस मामले में चुप क्यों?
कांग्रेस के कार्यकर्ता, जो विपक्ष में सरकार की नाकामी उजागर करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, इस बार कहां गायब हैं?
CPI और अन्य वामपंथी दल, जो खुद को गरीबों का पक्षधर बताते हैं, मजदूर परिवार के इस दर्द पर क्यों मौन हैं?
INTUC और SKMS जैसे यूनियन, जो एनएमडीसी के मजदूरों का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपने सदस्यों के परिवार की इस पीड़ा पर आंखें क्यों बंद किए हुए हैं?
क्या ये सभी नेता सिर्फ़ पोस्टर, झंडे, रैली और वोट बैंक की राजनीति करते हैं? जनता की असली परेशानी से इनका कोई लेना-देना नहीं?
*बड़ा विरोधाभास: खनिज संपदा vs जनता की बदहाली*
दंतेवाड़ा जिला पूरे विश्व में अपनी खनिज सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। एनएमडीसी अरबों रुपये का मुनाफा कमाती है। नगरपालिका किरंदुल लाखों-करोड़ों रुपये का कर वसूलती है। फिर सवाल उठता है —
इतनी बड़ी कमाई के बावजूद एक भी आधुनिक मर्चरी वैन क्यों नहीं रखी जा सकती?
अगर मृत व्यक्ति एनएमडीसी का कोई बड़ा अधिकारी या नियमित कर्मचारी होता, तो क्या यही हालात होते?
मात्र 15 दिनों में यह दूसरा मामला है, जब एनएमडीसी अस्पताल में एंबुलेंस नहीं मिलने की शिकायत आई। पहले एक घायल व्यक्ति को भी इसी बेबसी का सामना करना पड़ा था।
क्या कुबेर नगरी किरंदुल में जिंदा रहना भी मुश्किल है और मरने के बाद भी आखिरी यात्रा इतनी तकलीफदेह होनी चाहिए?
जनता अब पूछ रही है…
किरंदुल और आसपास के क्षेत्र की जनता अब इन नेताओं से सीधे सवाल पूछ रही है:
आपके “समाजसेवी” होने का दावा कहां गया?
खनिज नीलामी और ठेकेदारी से कमाई करने वाले नेता, आम नागरिक की अंतिम यात्रा पर क्यों चुप हैं?
*क्या मरने के बाद भी किरंदुलवासियों को यही त्रासदी झेलनी पड़ेगी?*
कब तक सिर्फ दिखावे की राजनीति चलेगी? कब आएगी असली सेवा और जिम्मेदारी?
यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे दंतेवाड़ा जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक नाकामी और राजनीतिक इंसानियत पर सवाल खड़ा करती है।
अब समय आ गया है कि किरंदुल के दिखावे के नेता अपनी आंखें खोलें। अगर वे सच में जनता के प्रतिनिधि हैं तो इस मामले को उठाएं, जांच कराएं, एनएमडीसी और नगरपालिका पर दबाव बनाएं और कम से कम एक आधुनिक फ्रिजर युक्त शव वाहन की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
वरना इतिहास इन्हें सिर्फ भाषणबाजी करने वाले और जनता की मुसीबत में गायब होने वाले नेताओं के रूप में याद रखेगा।
*जनता अब इंतजार कर रही है — बयानबाजी का नहीं, ठोस कार्रवाई का।*
क्या किरंदुल के राजनेता इस बार भी चुप रहेंगे?
या आखिरकार उनकी नींद टूटेगी?

