*बस्तर में उत्साह के साथ मनाई गई वीर गुण्डाधुर भूमकाल की 116वीं स्मृति*

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*बस्तर में उत्साह के साथ मनाई गई वीर गुण्डाधुर भूमकाल की 116वीं स्मृति*

बस्तर की धरती आज भी अपने महान आदिवासी नायक वीर गुण्डाधुर के बलिदान और 1910 के भूमकाल विद्रोह की गौरवशाली गाथा को जीवंत रखे हुए है। यह विद्रोह अंग्रेजी शासन के जंगल नीतियों, जबरन श्रम और आदिवासी अधिकारों पर अतिक्रमण के खिलाफ एक ऐतिहासिक जन-उभार था, जिसमें धुरवा जनजाति के वीर गुण्डाधुर ने नेतृत्व किया। हजारों आदिवासियों ने अपनी संस्कृति, जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए ब्रिटिश राज के सामने डटकर मुकाबला किया, जिसे “भूमकाल” (भूकंप जैसा उभार) कहा गया।

हालिया आयोजन

4 फरवरी 2026 को ग्राम पंचायत हिरानार में भूमकाल स्मृति दिवस की 116वीं वर्षगांठ बड़े उत्साह से मनाई गई। कार्यक्रम में विभिन्न समाजों के प्रमुख, ग्राम हीरानार के सरपंच श्री रवि कश्यप, राजेश नाग, गणेश यादव, संतोष सेठिया, अजय शिवहरे, कोरकोट्टी सरपंच विजय कश्यप, मनीराम उजी, वैशु मंडावी, लुदरू नाग, कुरसोराम मौर्य, श्रीमती अंती वेग, शांति दीदी, दिनेश्वरी मांझी, सुश्री बुदरी ताती सहित छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष श्री राजाराम वटृटी, ब्लॉक अध्यक्ष भुवनेश्वर भारद्वाज और उपाध्यक्ष जसवीर नेगी शामिल हुए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता धुरवा समाज के जिला अध्यक्ष श्री जयराम कश्यप ने की। ग्राम के गायता और पेरमा पुजारी ने भी भाग लिया। यह आयोजन आदिवासी एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बना।

आगामी प्रमुख कार्यक्रम

10 फरवरी 2026 को बस्तर के ऐतिहासिक मेढका डोबरा, दन्तेवाड़ा में महान भूमकाल दिवस धूमधाम से मनाया जाएगा। इसमें धुरवा, धाकड़, माड़िया, कलार, राउत, हल्बा, महारा, घसिया, घड़वा, कुम्हार, सोनार, दोरला, कोया, परजा, कायस्त, क्षत्रिय, ब्राह्मण सहित सभी समाज के लोग भाग लेंगे। लाखों की संख्या में आदिवासी भाई-बहन, बुजुर्ग और युवा ब्लॉक मुख्यालय पर एकत्र होकर मूल संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुति, पारंपरिक खेल, तीरंदाजी प्रतियोगिता, कासन ढोल, लोक नृत्य, कर्मा नृत्य, सैनिक नृत्य, नाट नृत्य आदि शामिल होंगे।

22 फरवरी 2026 को फुटबॉल ग्राउंड, बचेली, बैलाडिला में उद्बोधन कार्यक्रम के साथ समापन होगा।

यह आयोजन न केवल वीर गुण्डाधुर और भूमकाल शहीदों को श्रद्धांजलि है, बल्कि आदिवासी समाज की एकजुटता, सांस्कृतिक विरासत और अधिकारों के प्रति जागरूकता को मजबूत करने का माध्यम भी बनेगा। बस्तर की यह गौरव गाथा आज भी युवाओं को प्रेरित करती है कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।

आदिवासी गौरव अमर रहे! वीर गुण्डाधुर अमर रहे!!

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