*किरंदुल का मुख्य बाजार: अराजकता का कब्रिस्तान या व्यापारियों का कत्लेआम? दो संगठन, दो दावे, शून्य काम—वादों की हत्या और बाजार की लाश!*

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*किरंदुल का मुख्य बाजार: अराजकता का कब्रिस्तान या व्यापारियों का कत्लेआम? दो संगठन, दो दावे, शून्य काम—वादों की हत्या और बाजार की लाश!*

किरंदुल—छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की लौहनगरी, जहां एनएमडीसी की खदानों से लोहा निकलता है, लेकिन मुख्य बाजार में व्यापार की सांसें दम तोड़ रही हैं। एक तरफ 56 साल पुराना बैलाडीला व्यापारी कल्याण संघ, दूसरी तरफ हाल ही में जन्मा किरंदुल चैंबर ऑफ कॉमर्स—दोनों संगठन खुद को व्यापारियों का मसीहा बताते हैं, लेकिन हकीकत में दोनों दिखावे की राजनीति के शिकार हो चुके हैं। चुनाव आते हैं, बड़े-बड़े वादे ठोकते हैं, जीतते हैं, और फिर बाजार की बदहाली पर पानी-फेर कर गायब!

चुनावी जुमले जो कब्र में दफन हो गए

चुनाव के मैदान में दोनों संगठनों ने जो बम गिराए थे, वो आज धूल चाट रहे हैं:

मुख्य बाजार को व्यवस्थित करेंगे — आज बाजार का मुहाना इतना तंग हो गया है कि छोटी कार घुसना मुश्किल, चारपहिया वाहन में परिवार लेकर घूमना तो ख्वाब बन गया।

एनएमडीसी के कूपन खुले बाजार में लाएंगे — यह वादा हवा में उड़ गया, कोई खबर नहीं।

एनएमडीसी और नगरपालिका से बाजार विस्तार करवाएंगे — न कोई मीटिंग, न कोई प्लान, न कोई कदम।

नतीजा? बाजार अब अतिक्रमण का अजायबघर बन चुका है। सड़कें दुकानों में तब्दील, गलियां जाम, आपात स्थिति में एम्बुलेंस या शव-वाहन के लिए जगह नहीं। हाल ही में एक शव को बाजार के अंदर घर तक पहुंचाने के लिए जगह न मिली—यह शर्मसार करने वाली घटना है। क्या व्यापारी संगठन सोए हुए हैं या जानबूझकर अंधे बने हुए हैं?

ग्रामीणों की सुनवाई नहीं, सिर्फ झंडा-फहराने की होड़

किरंदुल के आसपास के गांवों से आने वाले किसान, सब्जी-फल बेचने वाले छोटे व्यापारी परेशान हैं। साप्ताहिक बाजार में जगह नहीं, सड़कों पर लगी दुकानें दुर्घटना का सबब बन रही हैं। लेकिन दोनों संगठनों को फुर्सत कहां?

एक को क्रिकेट टूर्नामेंट कराने की होड़ लगी है।

दूसरे को दीवार घड़ी बांटने, झंडा-झंडी खेलने और मंच पर गुलदस्ता लेने में मजा आ रहा है।

गणतंत्र दिवस हो या अन्य कोई मौका—दोनों संगठन संयुक्त रूप से झंडा फहराते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन बाजार की अव्यवस्था पर एक शब्द नहीं। यह दिखावे की राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा है—जैसे लोकसभा-विधानसभा के नेता वादे करते हैं और पांच साल बाद गधे के सिर से सींग की तरह गायब!

मंत्री का वादा गायब, संगठन भी गायब—एक जैसी कहानी

ताजा उदाहरण लें: छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री केदार कश्यप ने गजराज कैंप के मंच से घोषणा की थी—नगरपालिका का कोई भी टैक्स या बिजली बिल जमा करने वाले हर व्यक्ति को नजूल भूमि, वन भूमि या रेलवे भूमि पर पट्टा मिलेगा। लेकिन मंत्री जी अदृश्य! ठीक वैसे ही दोनों व्यापारी संगठन वादों की हत्या कर चुके हैं।

वार्ड-8 के मुख्य बाजार में महीनों से अंधेरा छाया है, गली लाइटें खराब, 80% स्ट्रीट लाइटें बंद। लेकिन संगठनों के पास चिंता करने का वक्त नहीं। सवाल यह है—क्या आपातकाल में कोई मदद मिलेगी? क्या ग्रामीण बिना डर के बाजार आएंगे? क्या व्यापारी परिवार के साथ आराम से चारपहिया में घूम पाएंगे?

जागो व्यापारियो! अब और नहीं सहेगा बाजार

किरंदुल का मुख्य बाजार व्यापार का केंद्र होना चाहिए, जाम और अव्यवस्था का प्रतीक नहीं। लेकिन जब तक दोनों संगठन क्रिकेट, घड़ी-बांटने और मंच-साझा में लगे रहेंगे, तब तक बाजार की यह कब्रिस्तान वाली हालत बनी रहेगी।

व्यापारियों से अपील—अब जागने का वक्त है!

इन संगठनों से हिसाब मांगो।

वादों की पूर्ति करो या इस्तीफा दो।

बाजार को व्यवस्थित करने के लिए संयुक्त मोर्चा बनाओ।

अन्यथा यह अराजकता और बढ़ेगी, छोटे व्यापारी और ग्रामीण परेशान होते रहेंगे, और किरंदुल का बाजार मौत का बाजार बन जाएगा।

किरंदुल जागो! बाजार बचाओ! संगठनों को झटका दो—वादों की हत्या बंद करो!

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