*किरंदुल डांस चैंपियन में जजों की शर्मनाक लापरवाही: पक्षपातपूर्ण फैसले ने उजाड़ दिया सबका उत्साह, बचेली ग्रुप को गिफ्ट किया दूसरा स्थान!*
किरंदुल (दंतेवाड़ा), 18 जनवरी 2026: दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में आज आयोजित डांस चैंपियन नाइट का महासंग्राम, जो छोटे-छोटे कलाकारों से लेकर बड़े डांसर्स तक के शानदार प्रदर्शनों से सजा था, निर्णायकों की घोर लापरवाही और कुप्रत्यक्ष पक्षपात के कारण एक बड़ा काला धब्बा बन गया। आयोजकों की कड़ी मेहनत से सजी यह शाम, जहां उड़ीसा से आए रॉयल ग्रुप के दिलकश प्रदर्शन ने दर्शकों के दिलों को जीत लिया, वह निर्णायकों के गलत और पक्षपाती फैसलों की भेंट चढ़ गई। यह फैसला न केवल अन्य ग्रुप्स के साथ अन्याय है, बल्कि पूरे आयोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
कार्यक्रम में विभिन्न आयु वर्गों के सैकड़ों प्रतिभागियों ने एक से एक धमाकेदार डांस परफॉर्मेंस दीं। खास तौर पर उड़ीसा से पहुंचा रॉयल ग्रुप अपनी शानदार कोरियोग्राफी, जीवंत वेशभूषा और गहन संदेशों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया। अन्य ग्रुप्स ने भी अपने प्रदर्शनों में सांस्कृतिक संदेशों को बखूबी उकेरा, जो न केवल मनोरंजक थे बल्कि प्रेरणादायक भी। लेकिन, तीन निर्णायकों – जिनमें दो बचेली से और एक किरंदुल से थे – ने अपनी भूमिका का ऐसा दुरुपयोग किया कि बचेली के एक ग्रुप को दूसरा स्थान थमा दिया गया। यह ग्रुप, जिसका प्रदर्शन बाकी प्रतियोगियों के मुकाबले ‘ताश की पत्ती की तरह बिखरा हुआ’ था, न तो वेशभूषा में कोई आकर्षण था और न ही प्रदर्शन में कोई सार्थक संदेश। फिर भी, इन जजों ने खुलेआम पक्षपात करते हुए इसे पुरस्कार दे दिया, जो निष्पक्षता के हर सिद्धांत को तार-तार कर देता है।
यह फैसला इतना घिनौना और आधारहीन था कि कार्यक्रम स्थल पर ही दर्शकों का गुस्सा फूट पड़ा। कई लोगों ने खुलकर कहा, “जिन्हें निर्णय लेना ही नहीं आता, उन्हें निर्णायक की कुर्सी पर बैठने का हक ही क्या है?” यह पक्षपात न केवल रॉयल ग्रुप और अन्य मेधावी प्रतियोगियों के साथ धोखा है, बल्कि पूरे समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। निर्णायकों की यह लापरवाही आयोजन की सफलता को धूल चटा देती है, जहां आयोजकों ने महीनों की मेहनत से सब कुछ परफेक्ट बनाया था। क्या यह बचेली के स्थानीय प्रभाव का नतीजा है? या जजों की अक्षमता? सवाल वाजिब हैं, और इनकी जांच जरूरी है।
इस घटना से साफ जाहिर होता है कि ऐसे आयोजनों में निर्णायकों का चयन कितना संवेदनशील मुद्दा है। पक्षपातपूर्ण फैसले न केवल प्रतिभाओं को कुचलते हैं, बल्कि भविष्य के आयोजनों पर भी साये डालते हैं। आयोजकों और स्थानीय कलाकारों को तत्काल इसकी जांच करवानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी शर्मनाक घटनाएं न हों। अन्यथा, किरंदुल जैसे स्थानों पर सांस्कृतिक आयोजन मात्र दिखावा बनकर रह जाएंगे। दर्शकों की निराशा आज चरम पर है, और यह फैसला इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो चुका है।

