*नागार्जुन बुद्ध विहार, किरंदुल में सावित्रीबाई फुले की जयंती: एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उत्सव*

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*नागार्जुन बुद्ध विहार, किरंदुल में सावित्रीबाई फुले की जयंती: एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उत्सव*

दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में स्थित नागार्जुन बुद्ध विहार ने एक बार फिर सामाजिक सद्भावना और महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की है। 11 जनवरी 2026 को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, क्रांतिज्योति मातोश्री सावित्रीबाई फुले की जयंती बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई गई। यह आयोजन न केवल सावित्रीबाई के संघर्षपूर्ण जीवन को याद करने का अवसर बना, बल्कि विहार परिसर को एकता, पर्यावरण संरक्षण और नारी उत्थान के संकल्प का जीवंत केंद्र बना दिया।

सावित्रीबाई फुले (जन्म: 3 जनवरी 1831) ने 19वीं सदी में महिलाओं की शिक्षा के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया। उस दौर में जब लड़कियों को पढ़ाना पाप माना जाता था, उन्होंने पत्थरों की बौछार सहते हुए भारत में पहली बालिका विद्यालय की स्थापना की। उनके पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने जाति-लिंग भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई, विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया और समाज में समानता की नींव रखी। आज भी उनका जीवन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भरता और सम्मान प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।

इस अवसर पर सुबह से ही नागार्जुन बुद्ध विहार में परित्राण पाठ का आयोजन किया गया, जिसके बाद विहार परिसर में AM/NS India (ArcelorMittal Nippon Steel India) के सहयोग से पौधारोपण कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के प्रति विहार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। कार्यक्रम में AM/NS India के परियोजना प्रमुख श्री Y. राघवेलु की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिन्होंने पौध रोपण में सक्रिय भागीदारी की और सामाजिक जिम्मेदारी के महत्व पर प्रकाश डाला।

शाम को आयोजित सांस्कृतिक संध्या ने पूरे कार्यक्रम को नया आयाम दिया। किरंदुल में निवासरत सभी समाजों, धर्मों और समुदायों ने एक मंच पर आकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर प्रस्तुत की। गीतों, नृत्यों और लोक कलाओं के माध्यम से विविधता में एकता का सुंदर चित्र उभरा। इस संध्या को खास बनाने वाली प्रमुख अतिथि थीं दंतेवाड़ा जिले की प्रसिद्ध समाज सेविका राष्ट्रपति सम्मानित बुधरी बाई ताती, जिन्हें बड़ी दीदी के नाम से जाना जाता है। बड़ी दीदी ने कार्यक्रम में शिरकत कर अपनी प्रेरणादायक उपस्थिति से सबका मन मोह लिया।

जैसे सावित्रीबाई फुले ने अपना जीवन महिलाओं की शिक्षा और सम्मान के लिए समर्पित किया, वैसे ही बड़ी दीदी बुधरी बाई ताती का जीवन भी महिलाओं के उत्थान के लिए निरंतर संघर्ष से भरा हुआ है। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए अथक प्रयास किए हैं, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया है। उनकी मौजूदगी ने कार्यक्रम को गहरा भावनात्मक और प्रेरणादायक स्पर्श दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में प्रेरणा महिला समिति की अध्यक्षा श्रीमती नारायण और नगरपालिका अध्यक्षा रूबी सींग ने शोभा बढ़ाई। प्रेरणा महिला समिति के पदाधिकारी, नगरपालिका परिषद की महिला पार्षदों सहित कई गणमान्य महिलाओं ने भी भाग लिया। इस कार्यक्रम ने महिलाओं में आत्मविश्वास जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

किरंदुल को मिनी इंडिया कहा जाता है, और यह कार्यक्रम ठीक वैसा ही साबित हुआ। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदिवासी, बौद्ध—सभी समाज एक साथ आए, एक मंच पर नजर आए और अपने सामाजिक-सांस्कृतिक गीतों से परिचय दिया। यह एकता की जीती-जागती मिसाल थी, जहां विविधता सम्मान का विषय बनी।

यह कार्यक्रम विशेष रूप से महिलाओं के लिए था। सावित्रीबाई फुले के संघर्षपूर्ण जीवन की तरह, यह आयोजन महिलाओं की शिक्षा, सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित रहा। नागार्जुन बुद्ध विहार ने न केवल धार्मिक सद्भावना को बढ़ावा दिया, बल्कि सामाजिक जागरूकता का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। यह विहार छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में बौद्ध दर्शन के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक मुद्दों पर भी सक्रियता दिखाता है।

ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक बदलाव लाते हैं। सावित्रीबाई फुले की जयंती पर यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि शिक्षा ही वह शक्ति है जो अंधकार को दूर कर रोशनी फैलाती है, और महिला सशक्तिकरण ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव है। नागार्जुन बुद्ध विहार, किरंदुल ने इस संदेश को न केवल मनाया, बल्कि उसे जीया भी—एकता, प्रेम और संघर्ष के माध्यम से।

यह उत्सव न केवल एक समारोह था, बल्कि एक संकल्प था—महिलाओं के सम्मान, शिक्षा और समानता का!

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