*दंतेवाड़ा: रेवाली प्राइमरी स्कूल का जर्जर भवन, 21 साल में खंडहर, ठेकेदारों की लापरवाही उजागर*
दंतेवाड़ा जिले के कुंवाकोंडा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत रेवाली के पेटल पारा में स्थित प्राथमिक स्कूल भवन की हालत ने निर्माण गुणवत्ता और प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2001 में निर्मित यह भवन मात्र 21-22 वर्षों में ही खंडहर में तब्दील हो चुका है, जो सरकारी धन के दुरुपयोग और ठेकेदारों की मनमानी का जीवंत प्रमाण है।
*जर्जर भवन, बच्चों की सुरक्षा खतरे में*
इस प्राथमिक स्कूल भवन में शुरूआती 10-12 वर्षों तक कक्षाएं संचालित हुईं, लेकिन छत से मलबा गिरने की घटनाओं के बाद शिक्षकों ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस भवन में पढ़ाई बंद कर दी। वर्तमान में बच्चे अतिरिक्त कक्षों में पढ़ने को मजबूर हैं। भवन की दीवारों में दरारें, छत का टूटना और सीलन ने इसे पूरी तरह असुरक्षित बना दिया है। देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यह भवन कभी भी ढह सकता है।
*निर्माण में लापरवाही, ठेकेदारों की मनमानी*
इस भवन की स्थिति निर्माण में बरती गई लापरवाही को स्पष्ट दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री और ठेकेदारों द्वारा मानकों की अनदेखी के कारण यह भवन इतनी जल्दी जर्जर हो गया। दंतेवाड़ा जैसे आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में निरीक्षण की कमी के चलते ठेकेदार बिना किसी जवाबदेही के घटिया निर्माण कार्य करते हैं, जिसका खामियाजा स्थानीय समुदाय को भुगतना पड़ता है।
*प्रशासन की उदासीनता, निरीक्षण का अभाव*
रेवाली जैसे आंतरिक क्षेत्रों में अधिकारियों का दौरा न के बराबर होता है। इस स्कूल भवन की स्थिति वर्षों से बिगड़ती जा रही है, लेकिन न तो कोई निरीक्षण हुआ और न ही मरम्मत के लिए कोई कदम उठाया गया। ग्रामीणों और शिक्षकों ने कई बार प्रशासन को इसकी सूचना दी, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि सरकारी खजाने की लूट को भी उजागर करती है।
*हाल ही में अन्य राज्यों में जर्जर स्कूलों से सबक*
हाल ही में राजस्थान के झालावाड़ में एक जर्जर स्कूल भवन की छत गिरने से सात बच्चों की मौत और कई के घायल होने की घटना ने देशभर में हड़कंप मचा दिया। इस घटना के बाद प्रशासन ने स्कूल भवनों की सुरक्षा जांच के निर्देश दिए, लेकिन रेवाली प्राइमरी स्कूल जैसे कई भवन अभी भी उपेक्षा के शिकार हैं। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो दंतेवाड़ा में भी ऐसी त्रासदी होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
*ग्रामीणों और शिक्षकों की मांग*
स्थानीय शिक्षकों और ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस भवन को तत्काल असुरक्षित घोषित कर बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। साथ ही, नए भवन के निर्माण और पुराने भवन के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों पर कठोर कार्रवाई की मांग उठ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो वे अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजने से इनकार कर देंगे।
*सरकार और प्रशासन से सवाल*
21 साल में खंडहर बन चुके इस भवन के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री और गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं की गई?
ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने के लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाए?
दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूल भवनों के नियमित निरीक्षण के लिए कोई ठोस नीति क्यों नहीं है?
सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद बच्चों को असुरक्षित भवनों में पढ़ने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
*आगे की राह*
यह घटना न केवल रेवाली प्राइमरी स्कूल तक सीमित है, बल्कि छत्तीसगढ़ के कई अन्य ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्कूल भवनों की स्थिति भी चिंताजनक है। सरकार को चाहिए कि तत्काल प्रभाव से सभी जर्जर स्कूल भवनों की जांच कराई जाए, ठेकेदारों की जवाबदेही तय की जाए और नए भवनों के निर्माण के लिए समयबद्ध योजना बनाई जाए। बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष
रेवाली प्राइमरी स्कूल का जर्जर भवन न केवल ठेकेदारों की लापरवाही, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का भी प्रतीक है। यह समय है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सरकारी खजाने की लूट और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ को और बढ़ावा देगा।

