*किरंदुल-बचेली का मुक्तिधाम: नवरत्न कंपनी NMDC और धनी नगरपालिका की उदासीनता का दंश*
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बसे किरंदुल और बचेली, भारत की नवरत्न कंपनी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NMDC) के प्रमुख खनन क्षेत्रों के रूप में जाने जाते हैं। यह क्षेत्र न केवल देश के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादकों में से एक है, बल्कि आर्थिक रूप से छत्तीसगढ़ की सबसे समृद्ध नगरपालिकाओं में भी शुमार है। लेकिन, इस समृद्धि के बीच एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जो हर किसी के मन को झकझोर देती है। किरंदुल-बचेली का एकमात्र मुक्तिधाम, जहां लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करते हैं, आज बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है। बारिश के मौसम में शवदाह के बाद अस्थियों को बचाने के लिए लोग तिरपाल का सहारा लेने को मजबूर हैं, क्योंकि मुक्तिधाम का लोहे का शेड पूरी तरह जर्जर हो चुका है और कभी भी ढहने की कगार पर है।
*मुक्तिधाम की दयनीय स्थिति*
किरंदुल-बचेली का मुक्तिधाम स्थानीय निवासियों के लिए अंतिम संस्कार का एकमात्र स्थान है। लेकिन इसकी स्थिति इतनी दयनीय है कि बारिश के दिनों में लोग अपने प्रियजनों की अस्थियों को पानी में बहने से बचाने के लिए तिरपाल लगाने को मजबूर हैं। मुक्तिधाम में बना लोहे का शेड, जो कभी शवदाह के दौरान लोगों को बारिश और धूप से बचाने का काम करता था, अब पूरी तरह जंग खा चुका है। इसकी चादरें टूट चुकी हैं, और शेड एक तरफ झुक गया है, जिससे यह कभी भी गिर सकता है। इस स्थिति ने न केवल अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को कठिन बना दिया है, बल्कि लोगों के लिए भावनात्मक और मानसिक पीड़ा का कारण भी बन रहा है।
स्थानीय निवासी धर्मेंद्र प्रशाद बताते हैं, “अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देना पहले से ही दुखद होता है, लेकिन जब हमें उनकी अस्थियों को बारिश से बचाने के लिए तिरपाल ढूंढना पड़ता है, तो यह दुख और बढ़ जाता है। यह शर्मनाक है कि इतने समृद्ध क्षेत्र में हमारी मूलभूत सुविधाएं इस हाल में हैं।”
*NMDC और नगरपालिका की भूमिका*
NMDC, जो भारत की सबसे बड़ी लौह अयस्क उत्पादक कंपनी है और 72.43% हिस्सेदारी के साथ भारत सरकार के अधीन संचालित होती है, ने किरंदुल और बचेली को देश के नक्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। कंपनी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) के तहत कई पुरस्कार भी जीते हैं, जैसे 2018 में ग्लोबल मेटल्स अवॉर्ड और 2019-20 में स्कोप एमिनेंस अवॉर्ड। लेकिन इस नवरत्न कंपनी की चकाचौंध के बीच मुक्तिधाम की बदहाली यह सवाल उठाती है कि क्या कंपनी और स्थानीय प्रशासन वास्तव में स्थानीय समुदाय की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं?
किरंदुल-बचेली नगरपालिका, जिसे छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिकाओं में से एक माना जाता है, भी इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ती नजर आती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार नगरपालिका और NMDC के अधिकारियों से मुक्तिधाम की मरम्मत और सुधार की मांग की, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। एक अन्य निवासी, लोमेस्वर ठाकुर कहते हैं, “हमने कई बार अधिकारियों से मुलाकात की, लेकिन हर बार हमें सिर्फ आश्वासन मिलता है। क्या हमारे प्रियजनों की अंतिम यात्रा के लिए एक सम्मानजनक स्थान मांगना भी गलत है?”
*जर्जर शेड का खतरा*
मुक्तिधाम का लोहे का शेड न केवल जंग से प्रभावित है, बल्कि इसकी संरचना भी इतनी कमजोर हो चुकी है कि यह कभी भी ढह सकता है। यह न केवल अंतिम संस्कार में शामिल लोगों के लिए खतरा है, बल्कि वहां मौजूद कर्मचारियों और पुजारियों के लिए भी जोखिम भरा है। बारिश के मौसम में शेड के नीचे खड़े होने की हिम्मत कोई नहीं करता, क्योंकि इसके गिरने का डर बना रहता है। इसके बावजूद, कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है, जिसके कारण लोग तिरपाल और अन्य अस्थायी साधनों का उपयोग करने को मजबूर हैं।
*सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता*
अंतिम संस्कार किसी भी समुदाय के लिए एक गंभीर और संवेदनशील प्रक्रिया होती है। हिंदू रीति-रिवाजों में अस्थियों का संग्रह और विसर्जन एक महत्वपूर्ण धार्मिक कर्म है। लेकिन मुक्तिधाम की इस हालत के कारण लोग न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं, बल्कि उन्हें अपमान और लाचारी का भी सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों के लिए, बल्कि NMDC और नगरपालिका की छवि के लिए भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
*NMDC और नगरपालिका की जिम्मेदारी*
NMDC, जो किरंदुल और बचेली में अपनी खनन गतिविधियों के लिए जानी जाती है, ने क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कंपनी ने बैलाडीला आयरन ओर माइन्स में अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जैसे स्क्रीनिंग प्लांट्स और स्लरी पाइपलाइन प्रोजेक्ट। लेकिन इन बड़े पैमाने की परियोजनाओं के बीच, स्थानीय समुदाय की बुनियादी जरूरतों, जैसे मुक्तिधाम की मरम्मत, को नजरअंदाज करना समझ से परे है।
इसी तरह, नगरपालिका, जो क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि का दावा करती है, ने भी इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिकाओं में से एक होने के बावजूद, किरंदुल-बचेली नगरपालिका का बजट और संसाधन इस समस्या को हल करने में उपयोग क्यों नहीं किए जा रहे, यह एक बड़ा सवाल है।
*समाधान की दिशा में कदम*
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि NMDC और नगरपालिका मिलकर मुक्तिधाम की स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाएं। कुछ संभावित समाधान इस प्रकार हो सकते हैं:
*शेड की मरम्मत या पुनर्निर्माण:* जर्जर लोहे के शेड को तुरंत हटाकर एक मजबूत और मौसम प्रतिरोधी संरचना का निर्माण किया जाए।
*बुनियादी सुविधाओं का विकास:* मुक्तिधाम में जल निकासी, बैठने की व्यवस्था, और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
*CSR के तहत पहल:* NMDC अपनी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) फंड का उपयोग मुक्तिधाम के पुनर्विकास के लिए कर सकती है।
*नगरपालिका की जवाबदेही:* नगरपालिका को नियमित निरीक्षण और रखरखाव के लिए एक समिति गठित करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न आए।
*सामुदायिक सहभागिता:* स्थानीय निवासियों को शामिल कर एक पारदर्शी प्रक्रिया के तहत मुक्तिधाम के सुधार कार्य किए जाएं।
*निष्कर्ष*
किरंदुल-बचेली का मुक्तिधाम केवल एक स्थान नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, संस्कृति और भावनाओं का प्रतीक है। यह शर्मनाक है कि एक नवरत्न कंपनी और छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिका के क्षेत्र में इतनी मूलभूत सुविधा की कमी हो। NMDC और किरंदुल-बचेली नगरपालिका को इस मामले में तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि लोगों को अपने प्रियजनों को सम्मानजनक विदाई देने का अधिकार मिल सके। यह न केवल सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल है, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता का भी मामला है। यदि इस दिशा में जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह क्षेत्र की समृद्धि पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाएगा।

