घरेलु सिलैंडर की कालाबाज़ारी का बड़ा खेल पर सरकारी अमला की बड़ी कारवाही :– घरेलु सिलैंडर कालाबाज़ारी का का गुनेहगार कौन
*जिला खाद्य विभाग राजस्व विभाग नगर पालिका एवं पुलिस की संयुक्त टीम ने दिया दबिश घरेलू सिलेंडर जप्ती के साथ 47 खाद्य नमूने जांच के लिए किया गया संकलित एवं की गई चालानी कार्यवाही*
किरंदुल:- नगर पालिका किरंदुल क्षेत्र अंतर्गत विभिन्न होटल एवं दुकानों में खाद्य एवं सुक्षा विभाग ,जिला खाद्य विभाग ,राजस्व विभाग ,नगर पालिका किरंदुल एवं पुलिस प्रशासन द्वारा नगर के फुटबॉल ग्राउंड कॉम्प्लेक्स के होटल, डेली नीड्स,बस स्टैंड के होटलों, मेन मार्केट के होटल इंडियन कॉफी हाउस आर्सेलर मित्तल हॉस्टल कैंटीन एवं अन्य दुकानों में औचक निरीक्षण किया जिसमें साफ सफाई ,दुकानों के सामनों में एक्सपायरी डेट की वस्तु,घरेलू उत्पाद,मिठाई,दही, दूध,आदि का सैंपल एकत्रित कर जांच के लिए भेजा एवं प्रकरण तैयार कर कार्यवाही की गई साथ ही विभिन्न दुकानों से कुल 11 नग़ घरेलू सिलेंडर जप्त कर प्रकरण तैयार किया गया एवं दूसरी बार केवल व्यावसायिक सिलेंडर उपयोग के लिए कहा गया साथ ही स्वच्छता न रखने के कारण कुल 1600 रुपए एवं अनुज्ञप्ति न होने के कारण 1600 कुल 3200 रुपए का चालान काटा गया तथा 47 खाद्य नमूना खाद्य प्रतिष्ठानों से संकलित किया गया एवं 5 खाद्य प्रतिष्ठानों को अनियमित पाए जाने पर नोटिस जारी कर तत्काल सुधार हेतु निर्देशित किया गया इस कार्यवाही के दौरान तहसीलदार बड़े बचेली जीवेश सोरी, जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी दंतेवाड़ा सुष्मित देवांगन खाद्य निरीक्षक धीरेन्द्र कश्यप , मुख्य नगर पालिका अधिकारी शशिभूषण महापात्र,सहायक राजस्व निरीक्षक गौरीशंकर तिवारी, नरेश साहू, पुलिस विभाग से हेमंत साहू एवं अमल मौजूद रहे
सब से बड़ा सवाल की इन छोटे मोटे दुकानदार या बड़ी होटल या बड़ी बड़ी कंपनी तक सिलैंडर आता कहा से हैं सिलैंडर सप्लाई का मुख्या कौन
पहला मुद्दा: कालाबाजारी और एजेंसी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी एक गंभीर समस्या है, जो आमतौर पर तब होती है जब सब्सिडी वाले सिलेंडरों को गैर-कानूनी तरीके से व्यावसायिक उपयोग (जैसे होटल, दुकान, या बड़ी कंपनियों) के लिए बेचा जाता है। किरंदुल और बचेली जैसे छोटे औद्योगिक शहरों में, जहां एक ही सिलेंडर एजेंसी है, यह संभव है कि कालाबाजारी का खेल एजेंसी के स्तर पर या उसके सहयोग से हो रहा हो। लेकिन यह भी सच है कि कालाबाजारी का नेटवर्क सिर्फ एजेंसी तक सीमित नहीं होता—इसमें डिस्ट्रीब्यूटर, ट्रांसपोर्टर, और कभी-कभी स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत भी शामिल हो सकती है।
सरकार या प्रशासन छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई इसलिए आसानी से कर लेते हैं क्योंकि उनके पास सीमित संसाधन और प्रभाव होता है, जिससे वे आसान निशाना बन जाते हैं। वहीं, बड़ी एजेंसियों या कंपनियों पर कार्रवाई के लिए ठोस सबूत, बड़े पैमाने पर जांच, और उच्च अधिकारियों की मंजूरी चाहिए होती है।
अगर एजेंसी ही कालाबाजारी में शामिल है, तो उस पर कार्रवाई न होने के पीछे ये कारण हो सकते हैं:सबूतों की कमी
बिना पुख्ता सबूत के बड़ी एजेंसी पर हाथ डालना मुश्किल होता है।प्रभाव और रसूख: बड़ी कंपनियों या एजेंसियों के पास आर्थिक और राजनीतिक ताकत होती है, जो जांच को प्रभावित कर सकती है।
प्रशासनिक लापरवाही या भ्रष्टाचार:
कई बार स्थानीय अधिकारी भी इस खेल में शामिल हो सकते हैं, जिससे कार्रवाई रुक जाती है।दूसरा मुद्दा: बड़ी कंपनियों को सिलेंडर की आपूर्ति और “बड़ी मछली”किरंदुल और बचेली में एनएमडीसी जैसी बड़ी कंपनी और उससे जुड़ी ठेकेदार कंपनियां (एलएंडटी, कल्पतरु, आरडी) काम कर रही हैं। इनके 70% मजदूर बाहर से हैं, और उनकी भोजन व्यवस्था के लिए सिलेंडर की जरूरत पड़ती है। सवाल यह है कि ये सिलेंडर कहां से आते हैं और इन्हें कौन मुहैया कराता है?
संभावित स्रोत: घरेलू सिलेंडर सब्सिडी वाले होते हैं और आम जनता के लिए होते हैं, न कि व्यावसायिक उपयोग के लिए। अगर ये कंपनियां मजदूरों के लिए घरेलू सिलेंडर इस्तेमाल कर रही हैं, तो यह नियमों का उल्लंघन है। व्यावसायिक उपयोग के लिए अलग से कमर्शियल सिलेंडर उपलब्ध होते हैं, जो महंगे होते हैं। ऐसे में, लागत बचाने के लिए कंपनियां या उनके ठेकेदार घरेलू सिलेंडर का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।आपूर्ति का ढांचा: किरंदुल-बचेली में एक ही एजेंसी होने के कारण, यह संभव है कि यही एजेंसी इन कंपनियों को सिलेंडर सप्लाई कर रही हो। लेकिन बड़ी मात्रा में सिलेंडर की आपूर्ति के लिए एजेंसी अकेले जिम्मेदार नहीं हो सकती—इसके पीछे डिपो भी शामिल हो सकते हैं।”
बड़ी मछली” कौन?
बड़ी मछली” से तात्पर्य उन शक्तिशाली लोगों या संस्थाओं से हो सकता है जो इस आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करते हैं—जैसे स्थानीय अधिकारी, बड़े ठेकेदार, या एजेंसी मालिक जो बिना हिसाब-किताब के सिलेंडर बेचते हैं।सरकार सख्त क्यों नहीं?जटिल जांच प्रक्रिया: बड़ी कंपनियों और एजेंसियों पर कार्रवाई के लिए लंबी जांच, कागजी सबूत, और कई विभागों का समन्वय चाहिए। इसमें समय और संसाधन लगते हैं।आर्थिक हित: एनएमडीसी जैसी कंपनियां क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन पर कार्रवाई से औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं, जिसे सरकार टालना चाहती है।प्राथमिकता का अभाव: छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई से जनता को तुरंत राहत दिखती है, जबकि बड़े नेटवर्क को तोड़ने में समय लगता है और परिणाम तुरंत नहीं दिखते।
संभावित समाधानकंपनियों के लिए नियम सख्त करें: मजदूरों के लिए भोजन व्यवस्था में सिर्फ कमर्शियल सिलेंडर का इस्तेमाल अनिवार्य हो।एजेंसी की निगरानी:
सिलेंडर वितरण का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए, ताकि पता चले कि कितने सिलेंडर कहां गए।स्थानीय शिकायत तंत्र: किरंदुल-बचेली जैसे क्षेत्रों में कालाबाजारी की शिकायत के लिए सीधा तंत्र हो, जिससे बड़े स्तर पर जांच शुरू हो सके।तेल कंपनियों की जवाबदेही: तेल कंपनियों को उनके डिपो से एजेंसी तक सिलेंडर की ट्रैकिंग सुनिश्चित करनी चाहिए।
कार्रवाई न होने के पीछे सबूतों की कमी, प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता, और प्रशासनिक सुस्ती जैसे कारण हो सकते हैं। अगर स्थानीय लोग इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएं और ठोस सबूत जुटाएं, तो बड़ी मछलियों पर भी नकेल कसी जा सकती है।


