*नवरत्न से महरत्न की दौड़ में पर्यावरण और लोगों की बलि? किरंदुल-बचेली में धूल-धूसरित तबाही की सच्चाई*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) — एक समय बस्तर की शान माने जाने वाले किरंदुल और बचेली अब दिल्ली-मुंबई जैसे प्रदूषित मेट्रो शहरों की तरह धूल के सागर में तब्दील हो चुके हैं। एनएमडीसी (National Mineral Development Corporation) की Bailadila आयरन ओर माइन्स के विस्तार और तेज उत्पादन ने प्राकृतिक सौंदर्य को निगल लिया है। पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की खुदाई और अनियंत्रित धूल-कणों ने स्थानीय निवासियों, कर्मचारियों और पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है।
पहले था स्वर्ग, अब बन गया नर्क
कुछ वर्ष पहले तक किरंदुल-बचेली की हवा शुद्ध, प्राकृतिक और हरियाली से भरी थी। आज सुबह-शाम पूरा इलाका लाल-भूरे धूल कणों से घिरा रहता है। पेड़-पौधों पर मोटी धूल की परत जमी हुई साफ दिखती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि धूल अब सांस की बीमारियों, आंखों की समस्या और अन्य स्वास्थ्य दिक्कतों का कारण बन रही है। अगर यही स्थिति रही तो जल्द ही हर दसवें व्यक्ति को धूल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आने का खतरा है।
एनएमडीसी की Bailadila रेंज (किरंदुल और बचेली कॉम्प्लेक्स) भारत की सबसे शुद्ध आयरन ओर का स्रोत है। दशकों से यहां खनन हो रहा है, लेकिन हाल के विस्तार (capacity expansion) ने समस्या को और गहरा दिया है। ट्राइबल इलाके में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, ओवरबर्डन डंपिंग और खुली खुदाई से धूल का प्रदूषण बढ़ा है।
पुरानी शिकायतें, बार-बार की अनदेखी
रेड वॉटर समस्या: माइनिंग से निकलने वाला लाल पानी नदियों, खेतों और पीने के पानी को दूषित कर रहा है। हजारों एकड़ कृषि भूमि बंजर हो चुकी है, मवेशी प्रभावित हो रहे हैं और लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। 55 से ज्यादा गांव प्रभावित बताए जाते हैं।
धूल और वायु प्रदूषण: फ्यूजिटिव डस्ट, ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग, क्रशिंग और ट्रांसपोर्टेशन से PM10, PM2.5 जैसे कण हवा में फैल रहे हैं। NMDC दावा करता है कि स्प्रिंकलिंग, साइलो और कवर कन्वेयर से नियंत्रण है, लेकिन स्थानीय अनुभव इसके उलट है।
वन और जैव विविधता का नुकसान: Bailadila रिजर्व फॉरेस्ट में बड़े क्षेत्र प्रभावित। डिफॉरेस्टेशन, मिट्टी का कटाव और वन्यजीवों का विस्थापन हो रहा है।
ट्राइबल समुदाय (खासकर गोंड) लगातार विरोध कर रहे हैं। 2022 में भी प्रदर्शन हुए जहां उन्होंने कहा कि NMDC पर्यावरण मानकों का पालन नहीं कर रहा।
नवरत्न से महरत्न: विकास या विनाश?
NMDC Navratna कंपनी है और महरत्न status की ओर बढ़ रही है — इसका मतलब ज्यादा स्वायत्तता, बड़े निवेश और तेज विस्तार। लेकिन सवाल उठता है: क्या कर्मचारियों, स्थानीय निवासियों और प्रकृति की कीमत पर यह महरत्न बनेगी?
कंपनी EIA रिपोर्ट्स में mitigation measures (water sprinkling, plantation, monitoring) का दावा करती है और occupational health surveillance चलाती है। फिर भी ग्राउंड रियलिटी अलग है — धूल की मोटी परत, प्रदूषित पानी और बदलती आबोहवा इसे साबित करती है।
किरंदुल-बचेली का विनाश सिर्फ स्थानीय समस्या नहीं — यह खनन-आधारित विकास मॉडल की बड़ी चेतावनी है। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम अगर महरत्न बनना चाहता है तो पहले इन क्षेत्रों को फिर से हरा-भरा, स्वस्थ और रहने लायक बनाए। वरना “विकास” का नाम सिर्फ विनाश का पर्याय बन जाएगा।

