*किरंदुल में धूमधाम से मनाया गया संविधान दिवस: बाबासाहेब अम्बेडकर को श्रद्धांजलि, संविधान के मूल्यों का संकल्प*

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*किरंदुल में धूमधाम से मनाया गया संविधान दिवस: बाबासाहेब अम्बेडकर को श्रद्धांजलि, संविधान के मूल्यों का संकल्प*

किरंदुल, 26 नवंबर 2025 (स्पेशल रिपोर्ट): छत्तीसगढ़ के किरंदुल शहर में संविधान दिवस को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति एनएमडीसी वर्क फेडरेशन के तत्वावधान में धूमधाम से मनाया गया। यह कार्यक्रम न केवल संविधान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम बना, बल्कि डॉ. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के योगदान को भी उजागर करने का अवसर प्रदान किया। अम्बेडकर चौक में स्थित बाबासाहेब की प्रतिमा के समक्ष शुरू हुए इस आयोजन में एनएमडीसी परियोजना प्रमुख रविंद्र नारायण, महाप्रबंधक के.पी. सिंह, के.एल. नागवेणी, नगरपालिका अध्यक्ष रूबी सिंह, उपाध्यक्ष बबलू सिद्दीकी सहित गणमान्य जनप्रतिनिधि, यूनियन पदाधिकारी, अधिकारी, कर्मचारी और शहरवासी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। हरसोल ध्वनि के बीच आयोजित इस कार्यक्रम ने संविधान के लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत अम्बेडकर चौक में बाबासाहेब की प्रतिमा के सामने दीप प्रज्वलन से हुई। सभी अतिथियों और उपस्थित जनों ने मिलकर प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, जिसके बाद तिरंगे के साथ पंचशील का पाठ किया गया। यह क्षण भावुकता से भरपूर रहा, जहां सभी ने संविधान के प्रति अपनी निष्ठा का संकल्प लिया। इसके बाद जुलूस के रूप में सभी अम्बेडकर पार्क पहुंचे, जहां मुंबई की तर्ज पर निर्मित अम्बेडकर राजगृह में बाबासाहेब की एक अन्य प्रतिमा पर पुनः माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम में संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया गया, जो संविधान दिवस की एक प्रमुख विशेषता है। आयोजकों ने बताया कि यह आयोजन वंचित वर्गों के उत्थान और संवैधानिक अधिकारों के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।

*संविधान दिवस: लोकतंत्र की आत्मा को सजाने का पर्व*

26 नवंबर का दिन भारतीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। इसी दिन, वर्ष 1949 को संविधान सभा ने भारत के संविधान को औपचारिक रूप से अपनाया था, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इस दिन को ‘संविधान दिवस’ या ‘समविधान दिवस’ के रूप में मनाने की परंपरा वर्ष 2015 से शुरू हुई, जब भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर घोषित किया। इसका मुख्य उद्देश्य संविधान के महत्व को जन-जन तक पहुंचाना, डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों और अवधारणाओं का प्रसार करना है

संविधान दिवस की विशेषताएं इसे अन्य राष्ट्रीय पर्वों से अलग करती हैं। यह न केवल एक स्मृति दिवस है, बल्कि सक्रिय जागरूकता अभियान का प्रतीक है। हर वर्ष इस दिन सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक वाचन अनिवार्य होता है।इसके अलावा, भाषण प्रतियोगिताएं, निबंध लेखन, सेमिनार और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों, कर्तव्यों और संवैधानिक मूल्यों से परिचित कराते हैं। संविधान दिवस भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने का माध्यम बनता है, जहां न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संविधान ‘हम भारत के लोग’ की सामूहिक इच्छा का दर्पण है, जो विविधता में एकता को बढ़ावा देता है। किरंदुल जैसे छोटे शहरों में ऐसे आयोजनों से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में संवैधानिक चेतना का प्रसार हो रहा है, जो राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

*बाबासाहेब अम्बेडकर: संविधान के मुख्य वास्तुकार और ‘आधुनिक भारत का मनु’*

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का भारतीय संविधान में योगदान अपरिमेय है। उन्हें ‘संविधान के निर्माता’ और ‘आधुनिक भारत का मनु’ कहा जाता है। संविधान सभा में 299 सदस्यों के बीच अम्बेडकर को ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनाया गया, जो उनकी कानूनी विशेषज्ञता, सामाजिक न्याय की समझ और वैश्विक संविधानों के गहन अध्ययन का प्रमाण था। उन्होंने विभिन्न देशों के संविधानों—जैसे अमेरिकी, आयरिश और ब्रिटिश—का विश्लेषण कर भारतीय संदर्भ में अनुकूलित किया।

अम्बेडकर का विश्लेषण दर्शाता है कि संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का औजार है। उन्होंने अस्पृश्यता के उन्मूलन को संविधान का मूल आधार बनाया, अनुच्छेद 17 के माध्यम से छुआछूत को अपराध घोषित किया। मौलिक अधिकारों (भाग III) में समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22) और शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24) जैसे प्रावधान अम्बेडकर की दूरदृष्टि का परिणाम हैं। इन्होंने वंचित वर्गों—विशेषकर दलितों, आदिवासियों और महिलाओं—को सशक्त बनाने का आधार प्रदान किया। उदाहरणस्वरूप, आरक्षण प्रणाली (अनुच्छेद 15, 16, 330-342) ने सामाजिक न्याय को संस्थागत रूप दिया, जो आज भी भारत की प्रगति का स्तंभ है।

अम्बेडकर के कार्यों का विश्लेषण करते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज’ बनाया। उन्होंने 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में कहा था, “जितना संभव हो सके, हमने संविधान को लचीला बनाया है ताकि यह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बदल सके।” उनका योगदान केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और दार्शनिक भी था। बौद्ध दर्शन से प्रेरित होकर उन्होंने अहिंसा, करुणा और समानता को संविधान की आत्मा बनाया। उनके प्रयासों से संविधान हाथ से हिंदी और अंग्रेजी में लिखा गया, जो 395 अनुच्छेदों, 8 अनुसूचियों और 22 भागों में फैला हुआ है। आज, 75 वर्ष बाद भी, अम्बेडकर का दृष्टिकोण सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक नैतिकता को प्रेरित करता है।

*संविधान के कार्य: समानता से सशक्तिकरण तक*

भारतीय संविधान के कार्य बहुआयामी हैं। यह न केवल शासन की रूपरेखा प्रदान करता है, बल्कि नागरिकों को अपनी बात कहने, धर्म मानने और अवसरों की समानता का अधिकार देता है। संघीय ढांचे के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन सुनिश्चित करता है, जबकि निर्देशक सिद्धांत (भाग IV) राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने का मार्गदर्शन देते हैं। संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया, जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा (अनुच्छेद 29-30) और आपातकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 352-360) जैसे तत्व देश की स्थिरता बनाए रखते हैं।

अम्बेडकर के नेतृत्व में तैयार यह संविधान आजादी के बाद की चुनौतियों—जैसे विभाजन की हिंसा, आर्थिक असमानता और सामाजिक भेदभाव—का समाधान था। इसका विश्लेषण बताता है कि संविधान ने भारत को ‘विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र’ बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई। हाल के वर्षों में, जैसे तीन तलाक पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 14 के आधार पर) और अधिकारों की मान्यता, संविधान की प्रगतिशीलता को दर्शाते हैं। किरंदुल जैसे क्षेत्रों में, जहां खनन और औद्योगिक गतिविधियां प्रमुख हैं, संविधान के पर्यावरण संरक्षण (अनुच्छेद 48A) और श्रम अधिकार (अनुच्छेद 43) जैसे प्रावधान स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा करते हैं।

*निष्कर्ष: संवैधानिक मूल्यों को अपनाएं, राष्ट्र निर्माण में योगदान दें*

किरंदुल में मनाया गया यह संविधान दिवस न केवल एक स्थानीय आयोजन था, बल्कि राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। आयोजकों ने संकल्प लिया कि संविधान के मूल्यों को दैनिक जीवन में उतारा जाएगा। नगरपालिका अध्यक्ष रूबी सिंह ने कहा, “बाबासाहेब का संविधान हमें समानता का संदेश देता है; हमें इसे जीना होगा।” इसी प्रकार, एनएमडीसी प्रमुख रविंद्र नारायण ने जोर दिया कि वर्क फेडरेशन ऐसे आयोजनों से वंचितों का सशक्तिकरण करेगा।

संविधान दिवस हमें स्मरण कराता है कि लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की जिम्मेदारी पर निर्भर है। डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में, “संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि इसे लागू करने वाले भ्रष्ट हों, तो यह व्यर्थ है।” किरंदुलवासियों का यह उत्साह भरा आयोजन इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। आइए, हम सब मिलकर संविधान के सपनों को साकार करें—एक न्यायपूर्ण, समावेशी भारत का निर्माण करें।

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