*दंतेवाड़ा: बाढ़ की त्रासदी, सड़कों के गड्ढे और लोक निर्माण विभाग की उदासीनता – एक अनसुनी कहानी*
*जिला दंतेवाड़ा*
*किशोर कुमार रामटेके*
दंतेवाड़ा जिला, छत्तीसगढ़ का वह इलाका जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है, आजकल एक अलग ही वजह से सुर्खियों में है। यहाँ के लोग न सिर्फ प्रकृति की मार से जूझ रहे हैं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और अधिकारियों की उदासीनता ने उनकी मुश्किलों को दोगुना कर दिया है। खास तौर पर लोक निर्माण विभाग के मुख्य कार्यपालन अभियंता *शिव कुमार ठाकुर* का रवैया लोगों के गुस्से का केंद्र बन गया है। उनकी यह बात कि “मोबाइल की घंटी जितनी बजाना है बजा लो, मैं फोन नहीं उठाऊंगा,” अब दंतेवाड़ा के आम नागरिकों, ठेकेदारों और पत्रकारों के बीच एक चर्चित जुमला बन चुका है। लेकिन इस जुमले के पीछे छिपी है लोगों की पीड़ा, बेबसी और एक अनसुनी कहानी, जिसे आज हम आपके सामने ला रहे हैं।
*किरंदुल में जल प्रलय की दर्दनाक यादें*
21 जुलाई 2024 को किरंदुल में आई जल प्रलय ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था। यह वो दिन था जब प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया और लोगों के सपनों को मलबे में बदल दिया। एनएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) की 11सी माइनिंग से निकला काला मलवा बाढ़ के पानी के साथ बहता हुआ लोगों के घरों में घुस गया। दिन-रात की मेहनत से बनाए गए आशियाने मिट्टी और पानी के ढेर में तब्दील हो गए। लोग “त्राहिमाम-त्राहिमाम” चिल्लाते रहे, लेकिन उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। इस आपदा में इंसानों की जान तो नहीं गई, लेकिन चार गायों और दो कुत्तों जैसे बेजुबान प्राणियों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
किरंदुल को कभी ऐसा माना जाता था कि यहाँ बारिश कितनी भी हो, बाढ़ का खतरा नहीं हो सकता। लेकिन 2024 ने इस मिथक को तोड़ दिया। नगर पालिका के वार्ड नंबर 1, 3, 4, 5, 6, 7 और ग्राम पंचायत कोड़ेनेर के निवासियों को साल में तीन बार बाढ़ का सामना करना पड़ा। हर बार पानी उनके घरों में घुसा, उनकी जिंदगी को उथल-पुथल कर गया। तीसरी बार जब बाढ़ आई, तो लोगों का सब्र टूट गया। गुस्से में उबले नगरवासियों ने एनएमडीसी के चेकपोस्ट पर धरना शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि बाढ़ से बचाव के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
*प्रशासन और एनएमडीसी का समझौता: वादे हवा में*
धरने के बाद जिला प्रशासन और एनएमडीसी के अधिकारियों ने बाढ़ पीड़ितों के साथ एक समझौता किया। वादा किया गया कि बारिश खत्म होते ही नाले का चौड़ीकरण होगा। मौजूदा 2 मीटर चौड़े नाले को 8 मीटर चौड़ा बनाया जाएगा और यह काम एनएमडीसी अपनी निगरानी में करवाएगा। इस वादे के बाद धरना खत्म हुआ, लेकिन महीनों बीत गए, और आज तक नाले के चौड़ीकरण का कोई काम शुरू नहीं हुआ। ना कोई अधिकारी देखने आया, ना ही कोई ठोस कदम उठाया गया। अब बारिश का मौसम फिर से नजदीक आ रहा है, और लोगों के मन में डर बैठ गया है कि इस बार उनकी जिंदगी का क्या होगा।
*लोक निर्माण विभाग और शिव कुमार ठाकुर की उदासीनता*
इस बीच, जिला प्रशासन ने उस नाले की मरम्मत का काम शुरू करवाया, जिसमें बाढ़ आई थी। यह कदम उम्मीद की एक किरण लेकर आया, लेकिन यह उम्मीद तब धूमिल हो गई जब लोगों ने लोक निर्माण विभाग के मुख्य कार्यपालन अभियंता शिव कुमार ठाकुर से संपर्क करने की कोशिश की। लोग अपनी समस्याएँ बताना चाहते थे, सुझाव देना चाहते थे, लेकिन हर बार उन्हें निराशा हाथ लगी। ठाकुर साहब का फोन उठना तो दूर, उसकी घंटी बजने का भी कोई जवाब नहीं मिलता। “जितनी घंटी बजाना है बजा लो, मैं फोन नहीं उठाऊंगा,” यह उनका अंदाज अब दंतेवाड़ा में मशहूर हो चुका है।
यह शिकायत सिर्फ बाढ़ पीड़ितों की नहीं है। दंतेवाड़ा के आम नागरिकों, ठेकेदारों और यहाँ तक कि पत्रकारों ने भी ठाकुर की इस आदत का दंश झेला है। कई बार फोन करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार नतीजा वही – सन्नाटा। एक तरफ लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए तरस रहे हैं, दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारी फोन तक उठाने को तैयार नहीं। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि लोगों के बीच बढ़ते असंतोष को भी दर्शाती है।
*सड़कों का हाल: गड्ढों में सड़क या सड़क में गड्ढे?*
दंतेवाड़ा से किरंदुल तक की सड़क की स्थिति भी कम दयनीय नहीं है। यहाँ सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क, यह कहना मुश्किल है। लोग हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस रास्ते से गुजरते हैं। दो साल से इस सड़क का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन प्रगति इतनी धीमी है कि लोग परेशान हो चुके हैं। ग्रामीणों ने कई बार ठेकेदार, विधायक और कलेक्टर से शिकायत की, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने चक्काजाम तक कर दिया। ठेकेदार ने लिखित आश्वासन दिया कि दीवाली के बाद डामरीकरण शुरू होगा और 15 दिनों में काम में तेजी लाई जाएगी। लेकिन यह वादा भी हवा में उड़ता नजर आ रहा है।
लोक निर्माण विभाग के एसडीओ *मधुकुमार भौर्य* ने कहा कि ठेकेदार ने काम तेज करने का लिखित वादा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। सड़क पर पानी का छिड़काव तक ठीक से नहीं होता, जिससे धूल और कीचड़ लोगों की मुश्किलें बढ़ाते हैं। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय या बचेली जाने के लिए लोगों को हर कदम पर परेशानी का सामना करना पड़ता है।
*लोगों का दर्द और उम्मीद की किरण*
किरंदुल और दंतेवाड़ा के लोग आज दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ प्रकृति की आपदा ने उन्हें तोड़ा, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक उदासीनता ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बाढ़ से प्रभावित लोग अब यह सोचने को मजबूर हैं कि क्या इस बार बारिश फिर उनके सपनों को बहा ले जाएगी। सड़कों की हालत ने उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है, और जिम्मेदार अधिकारी फोन तक नहीं उठाते।
लेकिन इस अंधेरे में भी एक उम्मीद की किरण है। लोगों का गुस्सा और एकजुटता अब उनकी ताकत बन रही है। धरने, प्रदर्शन और चक्काजाम जैसे कदम दिखाते हैं कि वे अपनी आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेंगे। यह कहानी सिर्फ दंतेवाड़ा की नहीं, बल्कि उन तमाम इलाकों की है जहाँ लोग प्रशासनिक लापरवाही के शिकार हैं। सवाल यह है कि क्या शिव कुमार ठाकुर और लोक निर्माण विभाग अब भी चुप्पी साधे रहेंगे? क्या लोगों की पुकार अनसुनी ही रहेगी?
*निष्कर्ष: जिम्मेदारी कौन लेगा?*
दंतेवाड़ा के लोग आज एक जवाब चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान कब होगा। बाढ़ से बचाव के लिए नाले का चौड़ीकरण, सड़कों की मरम्मत और प्रशासनिक जवाबदेही – ये वो माँगें हैं जो अब और इंतजार नहीं कर सकतीं। शिव कुमार ठाकुर का “फोन नहीं उठाऊंगा” वाला रवैया शायद उनके लिए एक मजाक हो, लेकिन लोगों के लिए यह उनकी जिंदगी का सवाल है। यह वक्त है कि प्रशासन जागे, अपनी जिम्मेदारी निभाए और लोगों को वह राहत दे, जिसके वे हकदार हैं। क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो बारिश के साथ आने वाली अगली तबाही सिर्फ प्रकृति की नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी की भी होगी।
