- शुल्क वसूल कर समाचार लगाने का भी अपना मजा है, किन्तु आज का पाठक यह आसानी से समझ जाता है कि समाचार दुराग्रह,पूर्वाग्रह या शुल्क वसूल कर लगाया गया है,
पहली बार पिता के नेतृत्व में किरंदुल निकाय में बीजेपी ने अपना परचम लहराया था और अब पुत्र के नेतृत्व में 30 वर्षों बाद बीजेपी ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की जबकि वास्तविकता बिल्कुल इसके परे है,
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सच तो यह है कि पिता के समय हुए चुनाव नगर पालिका परिषद किरंदुल का प्रथम चुनाव था,बीजेपी को प्रत्याशी की तलाश थी इसी बीच जयदीप माकन को पार्टी ने प्रत्याशी घोषित कर दिया तब बीजेपी के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सोनू (छनु )राम सोढ़ी ने उक्त टिकट का कड़ा विरोध किया और सतविंदर सिंह उर्फ डब्बू नाम के एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दिलवा दिया जो बीजेपी का प्राथमिक सदस्य भी नहीं थे
इसके पीछे टिकट धारक और टिकट दिलाने वाले के बीच क्या समझौता था वह आज भी रहस्य ही बना हुआ है बहर हाल सतविंदर सिंह उर्फ डब्बू की छवि एक सीधे सरल,एकाकी जीवन जीने वाले व्यक्ति की थी,किरंदुल की जनता के लिए यह चुनाव एक नवीन बात थी और डब्बू के पास धनबल की कोई कमी नहीं थी कार्यकर्ताओं ने मेहनत की और डब्बू विजई हुए इसमें सोनू राम सोढ़ी (छनु )यानि पिता की कोई भूमिका थी ही नहीं,वे तो स्वयं बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़कर अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे,उन्हें सबसे कम वोट किरंदुल नगर से ही मिले थे
विश्वासी सूत्र से यह भी जानकारी मिली कि पुत्र का जहां तक सवाल है उन्हें इस लौह नगरी में सब डमी अध्यक्ष के रूप में जानते है मंडल अध्यक्ष बनने के बाद उनकी भूमिका और चुनाव में उनका उतना ही प्रभाव पड़ा जितना चींटी के काटने पर हाथी को पड़ता है, अध्यक्ष का चुनाव शैलेन्द्र सिंह ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव से जीता है या पार्टी के सिंबल के दम पर इसके पूर्व भी शैलेन्द्र सिंह बीजेपी के खिलाफ निर्दलीय लड़कर अध्यक्ष का ताज पहन चुके हैं
