नगर पालिका चुनाव संपन्न हो चुका है परिणाम आ चुके हैं, उपाध्यक्ष पद के लिए जोड़ तोड़ भी अपने चरम पर है समीकरण बन बिगड़ रहें हैं बहरहाल यह भविष्य के गर्भ में है
अंततः कौन सा समीकरण कौन सा छल कौन सी धूर्तता उपाध्यक्ष की कुर्सी का लक्ष्य भेद सकेगी,फिलहाल तो हम अध्यक्ष व पार्षदों के संपन्न चुनावों और परिणामों की ही बात करेंगें,सत्ता रूढ़ पार्टी परिणाम आने के बाद से ही जश्न में डूबी हुई है,उसके अति उत्साही नेता अपने मुंह मियां मिट्ठू की भूमिका में जीत की मदहोशी में गुम हैं और इस बिंदु की समीक्षा कोई करने को तैयार नहीं की किरंदुल नगर पालिका परिषद के 18 वार्डों में 13 वार्ड की हार का क्या कारण है
हर कोई अध्यक्ष पद की जीत का श्रेय लेने पर आमादा है, गौर तलब है कि शुरू से ही किरंदुल मंडल टिकट वितरण के मामले में असमंजस की स्थिति में था और कोई सटीक व अंतिम निर्णय लेने में पूर्णतया अक्षम रहा,पूर्वाग्रह और पक्षपात से ग्रस्त होकर टिकट का वितरण कर दिया गया इसके उपरांत विवाद बढ़ने पर अपने ही निर्णय को निरस्त कर कई वार्डों में प्रत्याशी ही बदल दिए गए,ऐसे प्रत्याशियों की सूची जारी की गई जिसमें कुछ प्रत्याशी बीजेपी के सदस्य ही नहीं थे, और कुछ ऐसे भी थे जो हाल में ही कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए थे, यहां यह सवाल भी लाजिमी है कि क्या यह पार्टी का चुनाव था यह किसी खास चेहरे पर चुनाव लड़ा गया था
बीजेपी ने अध्यक्ष पद पर शैलेन्द्र सिंह के चेहरे को दृष्टिगत रखते हुए उनकी धर्म पत्नी को प्रत्याशी घोषित किया गौर तलब है कि शैलेन्द्र सिंह ने पूर्व में बीजेपी से बगावत कर बीजेपी के अधिकृत प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव लड़कर जीत का परचम लहराया था उसके बाद उन्होंने 25 वर्षों तक बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा और वोट कटुआ बनकर बीजेपी के अध्यक्ष और पार्षदों को हराने में अहम भूमिका निभाते रहे किन्तु इन सब के बीच वे बीजेपी के कुछ शीर्ष नेताओं से निकटता बनाए रखने में सफल रहे और एक सुनियोजित योजना व लक्ष्य के साथ एक वर्ष पूर्व बीजेपी में शामिल होने में सफल रहे जिसमें उनके निजी सम्बन्धों ने महत्ती भूमिका अदा की व इन्हीं संबंधों ने उनकी पत्नी एक घरेलू कामकाजी महिला को अध्यक्ष पद का टिकट प्रदाय कर दिया जो कभी बीजेपी के किसी भी शाखा,मंडल या किसी राजनैतिक कार्यक्रम अथवा मूवमेंट का हिस्सा नहीं रहीं अतः यह दर्पण की तरह साफ है कि शैलेन्द्र सिंह का चेहरा ही आधार था न कि बीजेपी पार्टी ❔
यहां यह गौर करने योग्य बात है कि उक्त चुनाव में बीजेपी के पूर्व मंडल अध्यक्ष और अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर,उनके कार्यकाल में हुए लोक सभा व विधान सभा में जीत दिलवाने का श्रेय स्वयं को देने वाले धर्मपाल मिश्रा को 10 नम्बर वार्ड से पार्षद पद पर प्रत्याशी बनाया गया था और वे वहां से स्पष्ट रूप से पराजित हो गए जो कि गंभीर चिंतन का विषय है और यह इंगित करता है कि उन्हें स्वयं के लिए कितनी अधिक गलतफहमियां थीं,खुद शैलेन्द्र सिंह वार्ड क्रमांक 13 में मात्र 68 वोट अर्जित कर सबसे निचले पायदान पर पहुंच गए ये वही शैलेन्द्र सिंह हैं जो नगरपालिका परिषद किरंदुल के 18 वार्डों में किसी भी वार्ड से बिना किसी प्रचार प्रसार या बिना किसी पार्टी के सिंबल लिए जीत का दावा गाहे बगाहे करते ही रहते हैं, यही कारण है कि वह इस जीत को भी अपनी व्यक्तिगत जीत ही मानते हैं और यह कुछ हद तक सही भी है क्योंकि नगर की राजनीति में थोड़ी बहुत रुचि रखने वाले लोग और खुद शैलेन्द्र सिंह यह भली भांति जानते हैं कि पार्टी के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने उनकी हार को सुनिश्चित करने की मंशा से भीतराघात किया और नाना प्रकार के षडयंत्र किए किन्तु कुछ अज्ञात कारणों से उन्होंने चुप्पी साध रखी है,
वहीं दूसरी तरफ भितरघातियों के भी अपने तर्क हैं कि पच्चीस वर्षों तक बीजेपी के विरुद्ध कार्य में लिप्त व्यक्ति का कोई नैतिक अधिकार नहीं है कि वह दूसरों पर आरोप लगाए लेकिन चूंकि पद पर कब्जा रूबी सिंह यानी शैलेन्द्र सिंह का हो चुका है और बीजेपी शीर्ष नेतृत्व में उनकी पकड़ के मद्देनजर सभी भितरघातियों ने खुशी,बधाई आदि का मुखौटा पहन लिया है और मुझे यकीन है कि अब इन पांच वर्षों तक इसे उतारेंगे भी नहीं व शैलेन्द्र सिंह के साथ कदमताल करते रहेगें चूंकि इसी में उनकी भलाई भी है,उक्त चुनाव में एक किस्से का उल्लेख करना बेहद जरूरी है और दिलचस्प भी हुआ यह कि मंडल ने वार्ड क्रमांक 07 से रूपा रानी को टिकट दे दिया था किन्तु बाद में राजू चालीवाल पूर्व जिला महामंत्री एवं पूर्व पार्षद के कड़े विरोध को देखते हुए रूपा रानी का नाम काट दिया परिणाम स्वरूप रूपा रानी ने इसे अपमान मानते हुए नामांकन वापस लेने से मना कर दिया,फलस्वरूप वह निर्दलीय प्रत्याशी घोषित हो गई जब बीजेपी ने बागियों पर कार्यवाही की व निष्काषन आदेश जारी किया तो उक्त सूची में रूपा रानी का नाम नदारद था,इस पर किरंदुल के चुनाव प्रभारी सत्यजीत चौहान से जब एक कार्यकर्ता ने पूछा तो उनका जवाब था कि रूपा रानी पार्टी की सदस्य ही नहीं हैं तो निष्काषन कैसे करेंगे,अब यक्ष प्रश्न यह है कि जब सदस्य नहीं थी तो टिकट किस लिए दिया गया था क्या एक खास परिवार को किरंदुल मण्डल निशाना बना रहा था ❔प्रश्न तो उठेगा ही और आगे भी उठता रहेगा यह कलम सत्य का पर्दाफाश करने के लिए प्रतिबद्ध है
