नगर पालिका परिषद किरंदुल में हुआ वर्तमान चुनाव नेआज प्रबुद्ध,शिक्षित,विचारशील और बुद्धिजीवियों के समक्ष कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं,
लोगों में आज यह चर्चा और विश्लेषण करने लगे हैं कि क्या सही में जनता किसी प्रत्याशी को मुद्दे के आधार पर या उसके पूर्व के संघर्ष के आधार पर या फिर प्रत्याशी के व्यक्तित्व या वादों के दृष्टिगत अपना मत प्रदान करती है या फिर धनबल प्रत्याशी के चयन में अहम भूमिका अदा करता है
यदि लोक तंत्र के आदर्शों की बात करें तो प्रथम कथन ही सत्य प्रतीत होता है किन्तु यदि यथार्थ और वास्तविकता की बात करें तो द्वितीय कथन यानि धनबल चुनाव में अहम भूमिका अदा करता है और कहीं न कहीं चुनाव के ऊपर हावी हो जाता है
चुनाव में चिकन,मांस,मछली और बेहिसाब बहती और वितरित होती मदिरा जो धनबल से उपजे हुए पदार्थ हैं और उक्त के बाद नगद राशि प्रलोभन बतौर भी प्रत्याशियों की तरफ से वितरित किया जाता है,चुनाव के दौरान विभिन्न वार्डों में निरन्तर व खुले आम चलने वाले शाकाहारी और मांसाहारी भंडारे मेरे कथन के समर्थन में हैं व मजबूती से मेरे शब्दों की पुष्टि करते हैं,मैने स्वयं कई वार्डों का रात्रि में सघन दौरा किया है एवं खुले आम मतदाताओं के बीच धन का वितरण होना दर्ज किया है
यहां यह गौर तलब है कि निकाय चुनावों में प्रत्याशियों को प्रचार प्रसार के लिए कागजी कार्यवाही से निपटने के उपरांत बामुश्किल लगभग आठ दिनों का समय मिला था,कोई भी जाकर देख सकता है कि इन आठ दिनों में मदिरा दुकान में की गई कुल बिक्री पूरे वर्ष की होने वाली कुल बिक्री को चुनौती दे रही है, यहां यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि अचानक नगर की जनता का मदिरा से मोह बढ़ गया था या फिर बाहर से भारी तादाद में मदिरा प्रेमी नगर में गए थे सब लोकतंत्र के उत्सव चुनाव का ही असर था,सूत्रों से तो यह भी खबर है कि कुछ हाई प्रोफ़ाइल वार्डो में प्रत्येक घर ड्राई फ्रूट और बर्तन की सप्लाई भी की गई, प्रलोभन देने के अनेक रोचक किस्से इन चुनावों में दृष्टिगोचर हुआ इन सब के बाद अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इन सब नीतियों के तहत चुन कर आए प्रतिनिधि जनता के साथ इंसाफ करेंगें क्या वे शहर के विकास को अपना लक्ष्य निर्धारित करेगें क्या वे जनता की मूलभूत सुविधाओं को अपनी प्राथमिकताओं में रखेंगे क्या वे अपने द्वारा खर्च की गई मोटी रकम को भूलकर जनता की सेवा में लग जायेंगें या फिर हमेशा की तरह वसूली अभियान को ही प्राथमिकता देगें या फिर हमेशा की तरह निकाय के निर्माण कार्यों की बंदर बांट की होड़ में शामिल होकर धन उपार्जन में लिप्त होकर अपने द्वारा किए गए खर्च की वसूली को पूरा करना ही उनकी प्राथमिकता में होगा और अन्त में अपनी कलम को विराम देने से पूर्व एक प्रश्न आम जनता से भी क्या आप को इस विधि से भेजे व चुने गए प्रतिनिधियों से कोई अपेक्षा रखने का नैतिक अधिकार है,विचार अवश्य करें और जाते जाते यह भी जरूर कहूंगा कि नगर के सभी वार्डों में जिस नीति व विधि से चुनाव लड़ा गया है अब कोई गरीब और सिद्धांतवादी व्यक्ति कभी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेगा,वार्ड क्रमांक 17 से लड़ने वाले एक प्रत्याशी श्रीनू इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

