*किरंदुल नगरपालिका में ‘अदृश्य’ विधायक प्रतिनिधि का खेल: राजपत्र की धज्जियां उड़ाने वाला विवाद*
दंतेवाड़ा जिले की किरंदुल नगरपालिका एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार विवाद का विषय है अधिकृत व्हाट्सएप ग्रुप में प्रोटोकॉल अधिकारी द्वारा जारी संदेश, जिसमें “विशेष आमंत्रित” के रूप में विधायक प्रतिनिधि का उल्लेख किया गया। सवाल सीधा और तीखा है—नगरपालिका में आधिकारिक रूप से नियुक्त विधायक प्रतिनिधि कौन है? और क्या दंतेवाड़ा विधायक अपने ही सरकार के राजपत्र का सम्मान करते हैं?
क्या है मामला?
किरंदुल नगरपालिका के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में प्रोटोकॉल अधिकारी ने एक संदेश प्रसारित किया, जिसमें विशेष आमंत्रित सूची में “विधायक प्रतिनिधि” का नाम शामिल किया गया। विपक्ष (कांग्रेस) का आरोप है कि नगरपालिका में अभी तक कोई अधिकृत विधायक प्रतिनिधि नियुक्त ही नहीं है। फिर भी आधिकारिक मंच पर इस पद का उल्लेख किया जा रहा है। यह न सिर्फ प्रोटोकॉल का उल्लंघन है, बल्कि शासन के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना भी लगती है।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी राजपत्र में साफ प्रावधान है कि नगरपालिका अध्यक्ष, पार्षद, सरपंच या ऐसे जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदार (पति, बेटा, बेटी, पिता आदि) विधायक प्रतिनिधि या सांसद प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त नहीं हो सकते। हाल ही में (अगस्त 2026) नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने नियमों में संशोधन कर यह रोक और कड़ी कर दी है। विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों के परिवार के सदस्यों को प्रतिनिधि/समन्वयक बनाने पर स्पष्ट पाबंदी लगाई गई है। राजपत्र में प्रकाशन के साथ यह प्रावधान पूरे राज्य के नगरीय निकायों में लागू हो चुका है।
विपक्ष का सवाल और राजनीतिक पेच
कांग्रेस ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। उनका सवाल है—“यदि कोई नियुक्ति ही नहीं हुई, तो आधिकारिक ग्रुप में विधायक प्रतिनिधि का जिक्र कैसे हो गया? क्या यह जानबूझकर नियमों को दरकिनार करने की कोशिश है?” विपक्ष का आरोप है कि दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी (भाजपा) अपने ही सरकार के राजपत्र को नजरअंदाज कर रहे हैं।
गौरतलब है कि नवंबर 2024 में विधायक अटामी ने खुद जितेंद्र गुप्ता को किरंदुल नगरपालिका के विधायक प्रतिनिधि पद से हटाया था। उसके बाद से आधिकारिक नियुक्ति की कोई सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। फरवरी 2025 के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की रूबी शैलेन्द्र सिंह किरंदुल नगरपालिका की अध्यक्ष बनीं। ऐसे में “विधायक प्रतिनिधि” का अचानक आधिकारिक संदेश में आना सवालों के घेरे में है।
किरंदुल: विवादों का अजब-गजब सिलसिला
किरंदुल नगरपालिका पिछले कई दिनों से किसी-न-किसी विवाद में घिरी रही है। कभी अवैध निर्माण, कभी प्रशासनिक अनियमितताएं और अब यह प्रोटोकॉल घोटाला। आधिकारिक मंच पर बिना वैध नियुक्ति के किसी पद का उल्लेख करना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है। यदि कोई व्यक्ति अनौपचारिक रूप से काम कर रहा है, तो उसे आधिकारिक रूप से “विधायक प्रतिनिधि” कहना नियमों का खुला उल्लंघन है।
निष्कर्ष: जवाबदेही की मांग
यह मामला सिर्फ एक व्हाट्सएप संदेश का नहीं है। यह शासन के राजपत्र, प्रोटोकॉल और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का सवाल है। विपक्ष सही पूछ रहा है—आखिर किरंदुल नगरपालिका में अधिकृत विधायक प्रतिनिधि कौन है? यदि कोई नहीं है, तो आधिकारिक संदेश में इसका जिक्र क्यों? और यदि कोई है, तो उसकी नियुक्ति का राजपत्र/आदेश क्यों सार्वजनिक नहीं?
नगरीय प्रशासन, जिला कलेक्टर और विधायक कार्यालय को इस पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। अन्यथा “अजब-गजब कारनामे” का सिलसिला जारी रहेगा और जनता का विश्वास और कमजोर होगा। शासन के राजपत्र का सम्मान करना हर जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है—चाहे वह किसी भी दल का हो।
