*किरंदुल ठेकेदार संघ चुनाव: रीड की हड्डी टूटी या मजबूत कड़ी? 26 जुलाई को फैसला*

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*किरंदुल ठेकेदार संघ चुनाव: रीड की हड्डी टूटी या मजबूत कड़ी? 26 जुलाई को फैसला*

किरंदुल (दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़)। एनएमडीसी की आयरन ओर माइनिंग पर निर्भर इस इलाके में ठेकेदार संघ को स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीड़ की हड्डी माना जाता है। लेकिन सूत्रों और घटनाक्रम के अनुसार यह हड्डी फिलहाल 2 से 4 टुकड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। 26 जुलाई 2026 को होने वाले ठेकेदार संघ के चुनाव में यह फूट खुलकर सामने आने वाली है।

मुद्दा 1: 40 करोड़ से अधिक CSR फंड पर विरोध और फिर विश्वासघात

ठेकेदार संघ ने हाल ही में एनएमडीसी किरंदुल-बचेली परियोजना के 40 करोड़ रुपये से अधिक के CSR फंड वाले विकास कार्यों की निविदाओं का सामूहिक विरोध किया था। दंतेवाड़ा जिला कांग्रेस ने भी एनएमडीसी किरंदुल चेकपोस्ट पर एक घंटे से अधिक समय तक धरना दिया और यातायात बाधित किया। इस विरोध में किरंदुल के कुछ ठेकेदार शामिल हुए।

लेकिन सूत्र बताते हैं कि विरोध में हिस्सा लेने वाले कुछ ही ठेकेदारों ने बाद में उसी काम को पेटी (तेंदुआ/सब-कॉन्ट्रैक्ट) में ले लिया। बाकी विरोध करने वाले सदस्यों को ठेंगा दिखाते हुए काम आगे बढ़ा दिया गया। यही फूट संघ की एकता को सबसे बड़ा झटका दे रही है।

मुद्दा 2: चंदा दाता vs शराब में बिकने वाले ठेकेदार

किरंदुल में हर सार्वजनिक, सामाजिक या धार्मिक कार्यक्रम (दुर्गा पूजा, गणेश पूजा आदि) में ठेकेदार सबसे आगे रहते हैं। 5,000 से 10,000 रुपये तक चंदा देने वाले ये ठेकेदार सामाजिक कार्यों में उदारता दिखाते हैं।

लेकिन ठेकेदार संघ के चुनाव में कुछ ठेकेदार 500 से 1,000 रुपये की शराब की बोतल में खुद को बेचने लगते हैं। लोकसभा, विधानसभा या निकाय चुनावों में छोटे वोटर शराब लेकर वोट देते देखे जाते हैं, लेकिन यहां दानदाता स्तर पर यह सौदा हो रहा है। यह ठेकेदार वर्ग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।

मुद्दा 3: चुनाव पर क्या असर?

मलेरिया बुखार जैसा असर: फूट और विश्वासघात का प्रभाव चुनाव में तीव्र लेकिन अस्थायी साबित हो सकता है। कुछ पैनल या उम्मीदवार इस मुद्दे को उठाकर वोट बटोरने की कोशिश करेंगे।

चंद रुपये की दवाई: अगर चुनाव के बाद फिर सब कुछ सामान्य हो गया और ठेकेदार एकजुट होकर काम करने लगे, तो यह फूट जल्द गायब हो सकती है।

26 जुलाई का चुनाव इसी फूट का असली परीक्षण होगा। क्या ठेकेदार संघ अपनी रीड की हड्डी को फिर जोड़ पाएगा या टुकड़ों में बंटी एकता जारी रहेगी?

किरंदुल जैसे छोटे लेकिन औद्योगिक इलाके में ठेकेदार संघ की मजबूती सीधे स्थानीय विकास, रोजगार और एनएमडीसी जैसी बड़ी कंपनियों के साथ संबंधों से जुड़ी है। अगर फूट बनी रही तो CSR फंड के कामों में और बाहरी हस्तक्षेप बढ़ सकता है, जिसका नुकसान अंततः स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों को ही होगा।

चुनाव नजदीक है। ठेकेदार भाईयों को सोचना होगा—एकजुटता की कीमत शराब की बोतल से ज्यादा है या नहीं? 26 जुलाई का परिणाम सब कुछ साफ कर देगा।

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