*किरंदुल नगरपालिका में भ्रष्टाचार का धमाका: अस्थाई दखल शुल्क में लाखों की हेराफेरी, ठेकेदार बदलने का साजिशी खेल? मुख्य अधिकारी पर सवालों के घेरे में*

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*किरंदुल नगरपालिका में भ्रष्टाचार का धमाका: अस्थाई दखल शुल्क में लाखों की हेराफेरी, ठेकेदार बदलने का साजिशी खेल? मुख्य अधिकारी पर सवालों के घेरे में*

किरंदुल (दंतेवाड़ा), 18 जुलाई 2026 — छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की किरंदुल नगरपालिका में अस्थाई दखल शुल्क (टेम्परेरी एंट्री फीस) की वसूली को लेकर घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ है। सूत्रों और शिकायतों के अनुसार, 50 रुपये की जगह सैकड़ों रुपये वसूलने की माफिया वाली शैली अपनाई जा रही थी, जिसमें ठेकेदारों के बीच सांठगांठ, रिश्तेदारी और राजनीतिक दबाव की भूमिका सामने आ रही है। नगरपालिका मुख्य अधिकारी शशि भूषण महापात्र पर पक्षपात, दबाव में काम करने और जांच को दबाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

पहला कांड: सुखदेव पोयाम की निविदा पर बिजली की तेजी से कार्रवाई

पिछले वर्ष सुखदेव पोयाम को अस्थाई दखल शुल्क संग्रह की निविदा मिली थी। आरोप है कि उनके कर्मचारी (जो मनोज छालीवाल का रिश्तेदार भतीजा था) ने ट्रकों से 50 रुपये की बजाय 500 रुपये वसूले। जब यह खबर सामने आई, तब मुख्य अधिकारी शशि भूषण महापात्र ने महज 3-4 घंटे में विशेष नियम का हवाला देकर सुखदेव पोयाम की निविदा निरस्त कर दी।

ठेकेदार सुखदेव पोयाम ने लिखित माफी नामा दिया कि कर्मचारी से गलती हुई, लेकिन मुख्य अधिकारी ने इसे नजरअंदाज कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से, निविदा निरस्त होने के बाद छालीवाल परिवार ही इस काम को संभालता रहा।

दूसरा कांड: साहिल छालीवाल का नया घोटाला

मार्च 2026 में साहिल छालीवाल (मनोज छालीवाल के रिश्तेदार) की निविदा में फिर वही खेल। उनके कर्मचारी सुनील गुप्ता ने 50 रुपये की रसीद पर 250 रुपये वसूल किए। निविदा का अंतिम दिन होने के बावजूद पत्रकार दिलीप सिंह ने मुख्य अधिकारी से लिखित शिकायत की और कड़ी कार्रवाई की मांग की। लेकिन मुख्य अधिकारी पर जैसे सांप सूंघ गया — कोई जांच, कोई कार्रवाई नहीं।

RTI का मजाक: जनसूचना का अधिकार भी सोया

पत्रकार किशोर कुमार रामटेके ने पूरे मामले की जानकारी के लिए RTI दायर की। 30 दिन बीत गए, कोई जवाब नहीं। प्रथम अपील के बाद आधा-अधूरा जवाब आया, जिसमें सिर्फ खानापूर्ति नजर आई। जांच अधिकारी तक नियुक्त नहीं किया गया। सूत्र बताते हैं कि मनोज छालीवाल एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं और उनके सहयोगी नगरपालिका के ऊंचे पदों पर हैं, जिसके चलते मुख्य अधिकारी पूर्ण रूप से दबाव में हैं।

सवालों की बौछार:

क्या सुखदेव पोयाम को हटाने की पूर्व नियोजित चाल थी? भतीजे के जरिए गलती कराई गई, राजनीतिक दबाव से निविदा रद्द कराई गई और फिर छालीवाल परिवार को फायदा पहुंचाया गया?

मुख्य अधिकारी शशि भूषण महापात्र ने सुखदेव की निविदा बिना नोटिस, बिना सुनवाई के क्यों रद्द की? साहिल छालीवाल के खिलाफ सबूतों पर सिर्फ औपचारिकता क्यों?

क्या किरंदुल नगरपालिका संविधान से चलती है या नेताओं-बाहरी दबाव से?

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह छोटा घोटाला नहीं, बल्कि व्यवस्थित लूट का हिस्सा है। छालीवाल परिवार की राजनीतिक पहुंच ने जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

नगरपालिका मुख्य अधिकारी शशि भूषण महापात्र का पक्ष:

इस मामले पर उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। अगर वे जवाब देते हैं तो हम उन्हें प्रकाशित करेंगे।

यह मामला सिर्फ फीस वसूली का नहीं, बल्कि नगरपालिका में भाई-भतीजावाद, राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक निष्क्रियता का जीता-जागता उदाहरण है। जनता और मीडिया अब सवाल पूछ रही है — किरंदुल में भ्रष्टाचार पर लगाम कब लगेगी? जिला प्रशासन, लोकायुक्त और उच्च अधिकारियों को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।

धमाकेदार खुलासा: क्या छालीवाल परिवार ने सुखदेव पोयाम को फंसाकर खुद को सेट किया? मुख्य अधिकारी की भूमिका क्या है — निष्पक्ष अधिकारी या दबाव का शिकार? आगे की जांच से और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

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