*एनएमडीसी किरंदुल परियोजना ने लोहा गांव तक 8 किमी सड़क बनाने का कार्य प्रारम्भ किया: कलेक्टर के पैदल दौरे के बाद शुरू हुई विकास की नई कहानी, अब मरीज भी एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंच रहे*
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): बैलाडीला पहाड़ियों के पीछे बसा दंतेवाड़ा जिले का लोहा गांव अब अंधेरे और अलगाव से बाहर निकल रहा है। जहां कभी स्कूल, स्वास्थ्य सुविधा, बिजली और सड़क नाम को भी नहीं थी, वहीं आज सोलर लाइट जल रही है, हफ्ते में एक दिन स्वास्थ्य कैंप लग रहा है और सबसे बड़ी राहत — एनएमडीसी किरंदुल परियोजना द्वारा शुरू किया गया 8 किलोमीटर सड़क निर्माण कार्य — अब गांव की तकदीर बदल रहा है।
कुछ महीने पहले तक इस गांव तक पहुंचना सिर्फ पैदल जंगलों, पहाड़ों और नालों को पार करके ही संभव था। कोई भी वाहन यहां तक नहीं पहुंच पाता था। यही वजह थी कि गांव के लोग आज तक कभी वोट भी नहीं दे पाए थे। लेकिन दंतेवाड़ा के कलेक्टर दिवेस धुरु ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने 8 किलोमीटर पैदल चलकर जंगलों को पार किया और गांव पहुंचकर लोगों की परेशानियों को सुना। उनके इस दौरे के बाद विकास की गति तेज हुई।
दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी और जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुडामी ने भी गांव का दौरा किया। इसके तुरंत बाद एनएमडीसी किरंदुल परियोजना ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और लोहा गांव तक सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया। आज सड़क निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा है। आज सुबह बुजुर्ग महिला को बीमार होने पर गांव वाले बांस की कावड़ में कंधों पर उठाकर 8 किमी खड़ी चढ़ाई चढ़कर लाये थे — सुबह 9 बजे निकलकर दोपहर 2 बजे तक सड़क निर्माण स्थल तक पहुंचते थे
गांव वालों ने बताया, “पहले तो मरीज को कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता था, अब सड़क बनने से एम्बुलेंस आ रही है। कलेक्टर साहब के आने के बाद सब बदल गया।”
विश्लेषण:
यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि लोहा गांव के लिए विकास का नया अध्याय है। एनएमडीसी किरंदुल परियोजना ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत जो कदम उठाया है, वह आदिवासी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भूमिका का बेहतरीन उदाहरण है। कलेक्टर दिवेस धुरु के पैदल दौरे ने प्रशासन को जमीनी हकीकत से जोड़ा, जबकि एनएमडीसी ने तुरंत कार्रवाई करके साबित किया कि खनन क्षेत्र की कंपनियां सिर्फ मुनाफा ही नहीं, बल्कि स्थानीय विकास भी कर सकती हैं।
अब सोलर लाइट से गांव रोशन हो रहा है, स्वास्थ्य कैंप से मरीजों को नियमित इलाज मिल रहा है और सड़क बनने के बाद स्कूल, बिजली और अन्य सुविधाओं के आने की राह भी आसान हो गई है। लोहा गांव अब “अछूता गांव” से “विकास का मॉडल गांव” बनने की ओर बढ़ रहा है।
एनएमडीसी किरंदुल परियोजना के इस कदम ने न सिर्फ लोहा गांव के 16 से ज्यादा परिवारों की जिंदगी आसान की है, बल्कि पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए संदेश दिया है — जब प्रशासन और उद्योग हाथ मिलाते हैं, तो सबसे पिछड़े गांव भी मुख्यधारा में आ सकते हैं।
यह अच्छी खबर है! विकास की यह कहानी अब पूरे छत्तीसगढ़ के लिए प्रेरणा बन रही है।

