*एनएमडीसी की 50 मिलियन टन उपलब्धि: स्थाई कर्मचारियों की खुशी, ठेका श्रमिकों की उपेक्षा?* *यूनियनों पर सवाल, रीड की हड्डी को भी हिस्सा दो!*
भोपाल/हैदराबाद, 21 मार्च 2026 – नवरत्न कंपनी एनएमडीसी ने इतिहास रच दिया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत की पहली खनन कंपनी बनते हुए उसने एक वित्तीय वर्ष में 50 मिलियन टन लौह अयस्क उत्पादन का कीर्तिमान हासिल कर लिया है। इससे पहले का रिकॉर्ड 45.2 मिलियन टन (FY24) था। कंपनी के सीएमडी अमिताव मुखर्जी ने इसे ‘एनएमडीसी 2.0’ की सफलता बताया और कहा कि जिम्मेदार खनन, तकनीक और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं ने यह संभव किया। लेकिन इस खुशी के माहौल में एक बड़ा सवाल उठ रहा है – क्या यह उपलब्धि सिर्फ स्थाई कर्मचारियों की है, या उन ठेका श्रमिकों की भी जिन्हें कंपनी का ‘रीड की हड्डी’ कहा जाता है?
एनएमडीसी के विभिन्न परियोजनाओं (बैलाडिला, किरंदुल, बाचेली आदि) में स्थाई कर्मचारी परिवार खुशी मना रहे हैं। यूनियनों ने अलग-अलग तरीके से स्थाई कर्मचारियों के लिए विशेष उपहार, बोनस या अन्य लाभों की मांग रखना शुरू कर दिया है। लेकिन वही यूनियनें, जो कंपनी के हित की बात करती हैं, ठेका श्रमिकों को पूरी तरह अनदेखा कर रही हैं। ये वही ठेका श्रमिक हैं जो दिन-रात, वर्षा-धूप में खदान में उतरते हैं, मशीनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं और कंपनी को नवरत्न से महा-नवरत्न बनाने में अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं।
*ठेका श्रमिक – शरीर की रीड की हड्डी, लेकिन लाभों से वंचित?*
खनन उद्योग में ठेका श्रमिक बिना रुके उत्पादन बढ़ाते हैं। बिना उनकी मेहनत के 50 मिलियन टन का लक्ष्य सिर्फ कागज पर रह जाता। स्थाई कर्मचारी परिवारों की खुशी जायज है, लेकिन क्या यूनियनों ने एक बार भी ठेका श्रमिकों के लिए कोई मांग रखी? क्या उन्होंने सोचा कि इन श्रमिकों को भी इस खुशी का पूरा हिस्सा मिलना चाहिए?
विश्लेषण यही कहता है कि नहीं। तीनों प्रमुख यूनियनों ने इस मौके पर ठेका श्रमिकों को भूल गए लगते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ये श्रमिक अकुशल से कुशल स्तर पर काम कर रहे हैं, कुशल से ऊपरी श्रेणी तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। अगर यूनियनें स्थाई कर्मचारियों के लिए 100% मांग रख रही हैं, तो ठेका श्रमिकों के लिए कम से कम 50% लाभ (बोनस, प्रमोशन, स्किल अपग्रेडेशन या स्थायीकरण की प्रक्रिया) की मांग क्यों नहीं रख रही? या फिर सीधे प्रमोशन का प्रस्ताव – अकुशल को कुशल, कुशल को सुपरवाइजर स्तर तक – यह सबसे बड़ा ‘उपहार’ हो सकता है। इससे ठेका श्रमिकों का मनोबल बढ़ेगा, उत्पादन और बढ़ेगा और कंपनी 2030 तक 100 मिलियन टन का लक्ष्य आसानी से हासिल कर लेगी।
*क्या यूनियनें दोहरे मापदंड अपना रही हैं?*
यह कोई छोटा मुद्दा नहीं। एनएमडीसी जैसी नवरत्न कंपनी में ठेका श्रमिकों की संख्या स्थाई कर्मचारियों से कई गुना ज्यादा है। वे कंपनी के उत्पादन का आधार हैं। फिर भी हर खुशी के मौके पर उन्हें ‘छला’ जाता है – चाहे वह बोनस हो, प्रमोशन हो या सम्मान। यूनियनों को याद रखना चाहिए कि मजबूत यूनियन तभी कहलाती है जब वह सबसे कमजोर वर्ग (ठेका श्रमिक) की आवाज भी बने। अगर यूनियनें सिर्फ स्थाई कर्मचारियों तक सीमित रहेंगी, तो यह उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करेगा।
*समाधान का रास्ता साफ है*
इस खुशी के मौके पर यूनियनों को तुरंत एक संयुक्त बैठक बुलानी चाहिए और ठेका श्रमिकों के लिए भी मांग रखनी चाहिए:
50% विशेष बोनस या उपहार पैकेज।
स्किल आधारित प्रमोशन (अकुशल → कुशल → उपर की श्रेणी)।
चिकित्सा, शिक्षा और भोजन भत्ते में और सुधार।
एनएमडीसी प्रबंधन भी इस मामले में संवेदनशील हो। 50 मिलियन टन की उपलब्धि पूरे परिवार की है – स्थाई और ठेका दोनों की। अगर ठेका श्रमिकों को भी हिस्सा मिला तो यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि ‘समावेशी विकास की मिसाल’ बनेगी।
ठेका श्रमिकों की मेहनत को सलाम! यूनियनों, अब समय आ गया है कि रीड की हड्डी को भी मजबूत बनाओ – नहीं तो पूरा शरीर लड़खड़ा जाएगा। एनएमडीसी को महा-नवरत्न बनाने में ठेका श्रमिकों का योगदान कभी भूलना मत!
*यह विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ठेका श्रमिकों की पीड़ा और योगदान को सामने लाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। यूनियनों और प्रबंधन से अपील है कि वे इस मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लें।*


