*बस्तर का वो स्कूल जहाँ हेडमास्टर 4 साल में 20 दिन भी नहीं आए, फिर भी पूरी तनख्वाह ले रहे हैं!*

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*बस्तर का वो स्कूल जहाँ हेडमास्टर 4 साल में 20 दिन भी नहीं आए, फिर भी पूरी तनख्वाह ले रहे हैं!*

*रेवाली माध्यमिक शाला, दंतेवाड़ा : एक दर्दनाक सच्चाई जो सरकार की नींद उड़ा देनी चाहिए*

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 38 किमी और कुवाकोंडा ब्लॉक मुख्यालय से 25 किमी दूर बस्तर के घने जंगलों के बीच बसा है ग्राम पंचायत रेवाली। यहाँ का शासकीय माध्यमिक विद्यालय इन दिनों सुर्खियों में है, लेकिन गलत कारणों से।

यहाँ के हेडमास्टर टीकम साहू और सहायक शिक्षिका कौसल्या साहू ने पिछले चार साल में स्कूल आने को जैसे तौबा कर रखी है।

तथ्य जो सामने आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं :

हेडमास्टर टीकम साहू की पदस्थापना 28 फरवरी 2022 को रेवाली में हुई थी।

आज दिसंबर 2025 चल रहा है यानी लगभग 46 महीने हो चुके हैं।

लेकिन वे अब तक मुश्किल से 20 दिन भी स्कूल नहीं आए हैं।

सहायक शिक्षिका कौसल्या साहू तो एक साल मे केवल एक दिन स्कूल आईं, उसके बाद उनका कोई अता-पता नहीं।

स्कूल का चपरासी कहता है, “मैं तो टीकम साहू को पहचानता तक नहीं।”

रसोइया बताता है, “आखिरी बार 15 अगस्त को आए थे, उसके बाद कभी नहीं दिखे।”

हाजिरी रजिस्टर घर पर ले जाकर दूसरे शिक्षक उनसे साइन करवा लेते हैं।

गाँव के सरपंच राकेश कुमार ताती का दर्द :

“हम जिला कलेक्टर से मांग करते है कि ऐसे शिक्षकों को नौकरी से निकाला जाए। हमारे बच्चों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। ये लोग घर बैठे पूरी तनख्वाह ले रहे हैं, ये सरकारी खजाने पर डाका नहीं तो क्या है?”

*संकुल समन्वयक सोनाराम कोर्रम ने फोन पर खुलासा किया :*

“हमने कई बार बीईओ को शिकायत की, लेकिन बीईओ साहब का जवाब होता है – ‘जैसे चल रहा है, चलने दो’। हाजिरी कैसे होती है, हमें भी नहीं पता। सब मिले हुए हैं।”

सबसे बड़ा झटका : शनिवार-रविवार को भी छुट्टी!

पूरे छत्तीसगढ़ में शनिवार को सुबह 7:30 से 11:30 बजे तक स्कूल अनिवार्य था। लेकिन रेवाली स्कूल में पिछले कई सालों से हर शनिवार-रविवार को छुट्टी रहती थी। जब अगस्त 2025 में सीजी संविधान न्यूज के संपादक किशोर कुमार रामटेके यहाँ पहुँचे तो बच्चे सिर्फ मिड-डे-मील खाने आए थे। दो शिक्षक नाम के लिए मौजूद थे, बाकी कोई नहीं। सरपंच ने बताया, “गुरुजी लोग ही छुट्टी की घोषणा करते हैं।”

ये सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बस्तर के हजारों बच्चों का भविष्य दाँव पर है

जिस बस्तर को सरकार “नक्सल-मुक्त” और “विकास मॉडल” बनाने का दावा कर रही है, वहाँ के स्कूलों में अगर हेडमास्टर ही 20 दिन में एक बार आएँ, शिक्षिका साल मे एक दिन में एक बार दिखें, संकुल समन्वयक-बीईओ-डीईओ सब मिलकर लीपापोती करें, तो सवाल खुद-ब-खुद उठता है :

क्या ऐसे शिक्षकों के भरोसे बस्तर नक्सल-मुक्त होगा?

क्या ऐसे स्कूलों से निकले बच्चे मुख्य धारा में जुड़ पाएँगे?

क्या घर बैठे तनख्वाह लेने वालों को “शिक्षक” कहना भी उचित है?

ये सिस्टम की नाकामी है या मिलीभगत?

जब संकुल समन्वयक कह रहा है कि “बीईओ ने कहा – जैसे चल रहा है चलने दो”, तो साफ है कि लापरवाही ऊपर से नीचे तक फैली हुई है। हेडमास्टर और शिक्षिका की अनुपस्थिति कोई छिपी बात नहीं, गाँव वाला-वाला जानता है, फिर भी कार्रवाई शून्य। इसका मतलब एक ही है – पूरा तंत्र मिला हुआ है।

*बस्तर के बच्चे पूछ रहे हैं :*

*“हमारा दोष क्या है? हम क्यों शिक्षा से वंचित रहें सिर्फ इसलिए कि कुछ लोग घर बैठे वेतन ले रहे हैं?”*

माँग सिर्फ इतनी है :

हेडमास्टर टीकम साहू और शिक्षिका कौसल्या साहू को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया जाए।

पिछले 4 साल की पूरी तनख्वाह ब्याज सहित वसूली जाए।

बीईओ, डीईओ और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी जांच हो, जिन्होंने आँखें मूंद रखीं।

रेवाली जैसे स्कूलों में तुरंत ईमानदार शिक्षकों की नियुक्ति हो।

बस्तर को सुंदर बनाने का दावा करने वाली सरकार से सवाल है –

क्या आप बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले ऐसे “टीकम साहू-कौसल्या साहू” को बचाते रहेंगे?

या अब भी समय है कि बस्तर के बच्चों को उनका हक मिले?

रेवाली का ये स्कूल चीख-चीख कर बता रहा है –

बस्तर का भविष्य तब तक अंधेरे में रहेगा, जब तक शिक्षा व्यवस्था में बैठे भ्रष्टाचारी और निकम्मे लोग सजा नहीं पाएँगे।

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