*किरंदुल/बचेली की सड़कों पर उत्तरप्रदेश की 7-सीटर मारुति ईगो बनीं ‘माल की घोड़ागाड़ी’, प्रशासन की आँखें बंद, हादसे का इंतजार!*
किरंदुल/दंतेवाड़ा, 24 नवंबर 2025: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल-बचेली क्षेत्र में उत्तरप्रदेश की 7-सीटर पर्सनल वाहन मारुति ईगो, जो मूल रूप से परिवारों के लिए डिज़ाइन की गई है, अब खुले तौर पर मालवाहक ‘ट्रक’ की भूमिका निभा रही है। छत पर 2-4 फीट ऊँचे माल के ढेर, अंदर पैसेंजर्स की सीटों पर ठूँसा हुआ सामान—ये नज़ारा अब रोज़मर्रा की बात हो गया है। लेकिन दंतेवाड़ा ट्रैफिक पुलिस और RTO का रवैया? बिल्कुल ‘आँखें मूंदो और सो जाओ’ वाला! इन अवैध ‘माल-ईगो’ वाहनों पर न तो कोई कार्रवाई, न जाँच, न परमिट की पड़ताल। क्या ये वाहन मालिकों के पास ऐसा ओवरलोडिंग का वैध परमिट है? या प्रशासन की आँखों पर पट्टी बंधी हुई है, जो सिर्फ हादसे के बाद ही खुलती है?
स्थानीय निवासियों की शिकायतें आसमान छू रही हैं। किरंदुल /बचेली के बाज़ारों और बचेली की संकरी सड़कों पर ये ईगो वाहन दौड़ते हुए दिखाई देते हैं, मानो कोई पिकअप हो। एक स्थानीय व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ये वाहन न सिर्फ ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि सड़क हादसों को न्योता दे रहे हैं। छत पर लटका माल गिर जाए तो पीछे का वाहन कुचला जाएगा, या ब्रेक फेल हो जाए तो पूरा काफिला तबाह।” पिछले कुछ दिनों में उत्तरप्रदेश की ऐसी कम से कम 2-4 ईगो वाहन इसी तरह लोडेड हालत में घूमते देखे गए हैं, लेकिन प्रशासनिक अमला? चुप्पी साधे हुए है। क्या ये ‘खुले बैल’ की तरह दौड़ते रहेंगे, जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए?
विश्लेषण करने पर साफ़ है कि ये सिर्फ ट्रैफिक उल्लंघन नहीं, बल्कि एक बड़ी सिस्टमिक विफलता है। मारुति ईगो एक मल्टी-पर्पस व्हीकल (MPV) है, जिसकी क्षमता महज 7 लोगों या हल्के सामान की है—न कि टनों माल की। मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 113-115 के तहत ओवरलोडिंग पर सख्त सज़ा है: जुर्माना से लेकर वाहन जब्ती तक। लेकिन किरंदुल/बचेली जैसे छोटे कस्बे में, जहाँ खनन क्षेत्र की वजह से माल ढुलाई की माँग बढ़ी है, ये वाहन सस्ते विकल्प के रूप में अवैध कारोबार चला रहे हैं। परिणाम? सुरक्षा का ग्राफ ज़ीरो पर! राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के मुताबिक, ओवरलोडेड वाहनों से होने वाले हादसे देशभर में 15% से ज़्यादा हैं, और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी इलाकों में ये आँकड़ा और भयावह है। दंतेवाड़ा में पिछले साल ही 50 से ज़्यादा सड़क हादसे हुए, जिनमें से कई ओवरलोडिंग से जुड़े थे—फिर भी सबक?
प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठना लाज़मी है। अधिकारीयों से संपर्क मे जवाब मिला: “जाँच जारी है।” जारी है? ये तो हवा में उड़ रही बातें लगती हैं! क्या ये वाहन मालिकों का कोई ‘राजनीतिक कनेक्शन’ है, जो इन्हें संरक्षण दे रहा है? या बस, छोटे कस्बे होने की वजह से ‘छूट’ मिल गई है? जनता परेशान है—व्यापारी हो या आम आदमी, हर कोई इन ‘मौत के सौदागरों’ से त्रस्त। एक स्कूल टीचर ने कहा, “बच्चों को स्कूल ले जाते वक्त ये ईगो दिखें तो दिल डूब जाता है। कब कोई मलबा गिरेगा, कौन जाने?”
अंत में सवाल वही: क्या किरंदुल-बचेली की सड़कें उत्तरप्रदेश पंजीयन की इन अवैध मालवाहकों का ‘फ्रीवे’ बनी रहेंगी? या सरकारी अमला आखिरकार नकेल कसेगा? हादसे का इंतज़ार मत करो, प्रशासन! जनता की पुकार सुनो, वरना कल की सुर्खियाँ ‘ईगो से बड़ा हादशा जैसी होंगी। दंतेवाड़ा कलेक्टर और ट्रैफिक पुलिस से माँग है: तुरंत चेकिंग अभियान चलाओ,उत्तरप्रदेश की ईगो वाहनों का परमिट जाँचो, और इन ‘घोड़ागाड़ियों’ को सड़क से उतारो।
