*दंतेवाड़ा के रेवाली-बर्रेम में विकास की चकाचौंध से कोसों दूर: काकड़ी नाला बन रहा मौत का नाला*

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*दंतेवाड़ा के रेवाली-बर्रेम में विकास की चकाचौंध से कोसों दूर: काकड़ी नाला बन रहा मौत का नाला*

दंतेवाड़ा, 6 दिसंबर 2025


छत्तीसगढ़ भले ही विकास के नए कीर्तिमान गढ़ रहा हो, लेकिन बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के कुंवाकोंडा ब्लॉक का रेवाली ग्राम पंचायत क्षेत्र आज भी उन मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है, जिन्हें हम सभ्यता की न्यूनतम शर्त मानते हैं। यहाँ स्कूल है, आंगनवाड़ी है, लेकिन इन तक पहुँचने का रास्ता नहीं। 9 किलोमीटर का समेली-रेवाली मार्ग आज भी कच्चा और गिट्टी से भरा पड़ा है, जबकि अंतिम 3 किलोमीटर बर्रेम से रेवाली तक तो जान जोखिम में डालकर ही तय किए जा सकते हैं। बीच में बहता काकड़ी नाला सालों भर पानी से लबालब रहता है।
शिक्षिका का दर्द: “अकेली महिला हूँ, नाला पार करना मौत को दावत देना है”
हाल ही में सीजी संविधान न्यूज़ में प्रकाशित एक खबर ने सनसनी फैला दी थी कि रेवाली के प्राथमिक शाला में नियुक्त शिक्षक पिछले 4 साल में महज 20 दिन ही स्कूल आए, जबकि एकमात्र महिला शिक्षिका कौशिल्या साहू पूरे एक साल में सिर्फ एक दिन स्कूल पहुँच पाईं।
खबर के वायरल होने के बाद जब शिक्षिका कौशिल्या साहू से बात की गई तो उन्होंने अपना दर्द बयां किया:
“मैं किरंदुल से रोज 42 किलोमीटर स्कूटी चलाकर आती हूँ। समेली तक का रास्ता ही इतना खराब है कि स्कूटी बार-बार फिसलती है। लेकिन असली खतरा काकड़ी नाला है। बर्रेम से आगे 3 किलोमीटर का रास्ता ही नहीं है। नाला में गर्मी-ठंड में 2-3 फीट और बारिश में 5-8 फीट तक पानी रहता है। मैं अकेली महिला हूँ। नाला पार करना मेरे लिए संभव नहीं। कई बार मैं बर्रेम तक पहुँचकर भी लौट आई। फिर भी लोग मुझे दोषी ठहराते हैं।”
मौत का आँकड़ा जो सरकारी फाइलों में नहीं दर्ज होता
रेवाली के सरपंच ने बताया,
“काकड़ी नाला को पार करके रेवाली, बर्रेम और आसपास के 4-5 गाँव के लोग किरंदुल, पालनार या जिला मुख्यालय आते-जाते हैं। बारिश के मौसम में हर साल 2 से 4 लोग इसी नाले में बहकर मर जाते हैं। पिछले साल एक गर्भवती महिला और एक बच्चा बह गया था। हमने दर्जनों बार पुल की मांग की, ज्ञापन दिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं।”
ग्रामीणों का कहना है कि नाला पार करने के लिए नाव तक नहीं है। लोग लकड़ी का सहारा लेकर या रस्सी बाँधकर जान जोखिम में डालते हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाते।
सवाल जो सरकार से पूछे जाने बाकी हैं
आंगनवाड़ी और स्कूल बनाने के बाद उस तक पहुँच मार्ग बनाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है क्या?
PMGSY और मनरेगा जैसी योजनाओं के करोड़ों रुपए खर्च होने का दावा किया जाता है, फिर रेवाली जैसे दर्जनों गाँव आज भी सड़क से वंचित क्यों?
क्या कोई अधिकारी कभी इस काकड़ी नाले को पार करके रेवाली पहुँचा है?
आज जब छत्तीसगढ़ सरकार ‘नवा छत्तीसगढ़-नवा सपना’ का नारा दे रही है, तब रेवाली जैसे सैकड़ों गाँव पूछ रहे हैं,
“हमारा सपना कब पूरा होगा? काकड़ी नाला पर एक छोटा सा पुल भी हमारी पहुंच से बाहर क्यों है?”
यह खबर कोई सनसनी नहीं, एक आईना है, जो उस विकास को दिखा रही है जो शहरों तक पहुँचा, पर जंगल के आखिरी छोर तक नहीं पहुँच सका।
अब देखना यह है कि कौशिल्या साहू और रेवाली के बच्चों का स्कूल जाने का सपना कब साकार होगा, या फिर काकड़ी नाला अगले बरसात में और कितनी लाशें निगलेगा?

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