*किरंदुल में ‘मौत का मकान’: नगरपालिका की नोटिस की अनदेखी से उठे सवाल, जानमाल को खतरा के जवाबदार नगरपालिका मुख्य अधिकारी*
दंतेवाड़ा, 4 दिसंबर 2025 (सी ज़ी संविधान न्यूज़)छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल नगरपालिका के वार्ड नंबर 8 में एक निर्माणाधीन मकान ने स्थानीय लोगों के बीच दहशत पैदा कर दी है। स्थानीय निवासियों और आंखों देखी घटनाओं के आधार पर यह मकान ‘मौत का न्योता’ बन चुका है, जहां बुनियादी सुरक्षा मानकों की ऐसी धज्जियां उड़ी हैं कि इसे देखकर हर कोई सिहर उठता है। नगरपालिका द्वारा निर्माण पूर्व जारी नोटिस के बावजूद इस ‘मौत के महल’ का निर्माण पूरा हो गया, जिससे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई दुर्घटना हुई, तो इसका पूरा जिम्मेदार नगरपालिका का प्रशासनिक तंत्र और नगरपालिका मुख्य अधिकारी होगा।
*निर्माण में घोर लापरवाही: नाली पर कब्जा, बिजली तारों का ‘खेल’*
यह मकान, जो वार्ड 8 के एक पार्षद राजकुमार सोनी के स्वामित्व वाला बताया जा रहा है, अपनी नींव से लेकर ऊपरी मंजिल तक सुरक्षा के हर मानक को ताक पर रखकर खड़ा किया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार:
नींव पर अतिक्रमण: मकान की नींव सीधे नगरपालिका की मुख्य नाली पर कब्जा करके डाली गई है। इससे न केवल जल निकासी की व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि भविष्य में बाढ़ या मलबा गिरने का खतरा मंडरा रहा है।
बिजली तारों का जाल: पहले माले के कमरों के बीचों-बीच खुले बिजली के तार लटकाए गए हैं। कमरे में घूमने के लिए सो कर चलना पड़ता है, अन्यथा करंट लगने का जोखिम है। रात में सोने वाले परिवार के सदस्यों के लिए यह ‘मौत का जाल’ साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर: पूरा निर्माण अतिक्रमण का जीता-जागता उदाहरण है। स्थानीय निवासी कहते हैं, “यह मकान नहीं, बल्कि मौत को बुलावा है। इसमें रहने वाले परिवार की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?”
फोटो और वीडियो साक्ष्यों से साफ झलकता है कि निर्माण में कोई इंजीनियरिंग मानक का पालन नहीं किया गया। एक बुजुर्ग निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमने कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। पार्षद साहब का रसूख देखिए, नोटिस जारी होने के बाद भी काम रुका नहीं।”
*नोटिस जारी, लेकिन कार्रवाई ‘शून्य’:नगरपालिका मुख्य अधिकारी शशिभूषण महापात्र पर सवाल*
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि किरंदुल नगरपालिका के मुख्य अधिकारी श्री शशिभूषण महापात्र द्वारा निर्माण शुरू होने से पहले ही मकान मालिक को नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में स्पष्ट रूप से अतिक्रमण और सुरक्षा उल्लंघन का जिक्र था, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सवाल उठता है:
*क्या मुख्य अधिकारी को ‘नोटों की चमक’ ने अंधा कर दिया?*
पार्षद के राजनीतिक दबाव में क्या प्रशासन ने आंखें मूंद लीं?
नाली और बिजली तारों पर कब्जे की जानकारी होने के बावजूद ‘मौन समर्थन’ क्यों?
स्थानीय कार्यकर्ता ने बताया, “यह पहला मामला नहीं है। किरंदुल में अतिक्रमण की भरमार है, लेकिन जब तक कोई बड़ा हादसा न हो, प्रशासन सोता रहता है। जुलाई 2024 में NMDC डैम टूटने से किरंदुल में 100 से अधिक मकान-दुकानें ढह चुकी थीं, तब भी सबक नहीं लिया गया।” छत्तीसगढ़ में हाल ही के अन्य हादसों—जैसे धमधा में नींव खुदाई के दौरान दो मजदूरों की मौत (नवंबर 2025) या रायपुर में निर्माण स्थल पर बच्चों की मौत—से साफ है कि निर्माण सुरक्षा की अनदेखी जानलेवा साबित हो रही है।
*जिम्मेदारी किसकी? प्रशासन पर भ्रष्टाचार का कलंक*
यदि इस मकान में कोई दुर्घटना हुई—चाहे आग लगे, छत गिरे या करंट से मौत हो—तो इसका पूरा श्रेय मुख्य अधिकारी शशिभूषण महापात्र और नगरपालिका टीम के कंधों पर होगा। पार्षद का ‘रुतबा’ दिखाने का आरोप तो लगा ही है, लेकिन मुख्य अधिकारी की भूमिका सबसे संदिग्ध है। उन्होंने न केवल नोटिस जारी किया, बल्कि निर्माण की पूरी प्रक्रिया पर नजर रखने का दायित्व भी था। विशेषज्ञों के अनुसार, छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम 1961 के तहत ऐसे निर्माण को तत्काल ध्वस्त करने का प्रावधान है, लेकिन यहां ‘समर्थन’ ही मिला।
निवासियों ने जिला कलेक्टर से तत्काल जांच और मकान सील करने की मांग की है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “यह केवल एक मकान का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है। पार्षद और अधिकारी मिलकर आम आदमी की जान जोखिम में डाल रहे हैं।”
आगे की राह: सख्ती की जरूरत
किरंदुल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में निर्माण निगरानी के लिए ड्रोन सर्वे और त्वरित टीम गठन की आवश्यकता है। राज्य सरकार को निर्देश देना चाहिए कि सभी नगरपालिकाओं में ‘सुरक्षित निर्माण अभियान’ चलाया जाए। फिलहाल, स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू करने का आश्वासन दिया है, लेकिन जनता का विश्वास तभी बनेगा जब कार्रवाई दिखे।
यह घटना छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों के लिए चेतावनी है—लापरवाही की कीमत जानमाल से चुकानी पड़ सकती है। क्या मुख्य अधिकारी जवाबदेह बनेंगे, या यह भी फाइलों में दब जाएगा? समय ही बताएगा।

