*उल्टा चोर कोतवाल को डाटे झिल्ली और मदिरा पर प्रतिबन्ध का सरकारी ढोंग क्यों*

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हमारे देश मे यह कहना बिलकुल उचित व सटीक होगा की बड़ी मछली को संरक्षण दिया जाता है वहीं दूसरी तरफ छोटी मछलियों का भक्षण कर लिया जाता है सरकार कोई भी राजनैतिक दल बनाये किन्तु रवैया एक जैसा ही होता हैं

यह बड़े आश्चर्य एवं रहस्य से घिरा हुआ विषय है की एक तरफ तो सरकार एकल उपयोग प्लास्टिक झिल्ली पर प्रतिबन्ध लगाती है वहीं दूसरी तरफ इन झिल्लीयों का उत्पादन करने वाली इकाइयों को पोषित करती है एवं संरक्षण प्रदान करती है

यहाँ यह गौर तलब है की सरकार द्वारा पोषित इन इकाइयों द्वारा भारी मात्र मे उक्त झिल्लीयों का उत्पादन करने पश्चात इनका खुले बाजार मे विक्रय कर दिया जाता है

और उसके बाद सरकारी एजेंसिया स्थानीय निकाय एवं पुलिस प्रशासन द्वारा छोटे फुटकर व्यवसाईयों के दुकान व मकान पे छापेमारी कर उक्त झिल्लीयों की जप्ती बनायीं जाती है एवं उन पर भारी जुर्माना भी रोपित किया जाता है है यह अत्यंत हास्यास्पद विषय है की सरकार द्वारा पोषित कारखानों मे कभी भी छापे मारी की कार्यवाही नहीं की जाती किन्तु जैसे ही उक्त झिल्लीयाँ खुले बाजार मे आती हैं समस्त सरकारी अमला फुटकर व्यवसाईयों पर टूट पड़ता है

सरकार का यह रवैया देख कर तो कभी कभी ऐसा भी आभास होता है की 1947 मे देश आजाद ही नहीं हुआ था बल्कि अब भी ईस्ट इंडिया कंपनी का ही राज चल रहा है

जनता एवं छोटे व्यवसाईयों को हैरान, परेशान करने के लिऐ यह एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है यह कोई प्लास्टिक से निजात दिलाने वाली मुहीम नहीं बल्कि एक ऐसा वाक्या है जिस पर टिप्पणी करना व उसे शब्दों मे समेटना नामुमकिन है

यह सब हमारे देश मे मज़ाक का विषय बन चूका है यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है की देश मे कई जगह मदिरा दुकान सरकार द्वारा संचालित की जा रही है किन्तु उक्त मदिरा को क्रय करने वाले एवं उक्त मदिरा का पान करने वाले लोगो पर सरकारी अमला पुलिस, आबकारी विभाग अपनी मुस्तैदी का परिचय देते हुऐ रोजाना कार्यवाही करती है

यहाँ यह उल्लेख करना चाहूंगा की जब मदिरा का निर्माण करने वाले एवं उक्त मदिरा का व्यापार करने वाले सरकार द्वारा पोषित व संरक्षित है एवं स्वयं सरकार उक्त कार्य करती है तो उक्त मदिरा को क्रय करने वाले एवं इसका ऊपभोग करने वाले दोषी कैसे हुऐ जहाँ तक मेरा अनुमान है की पुरे विश्व मे कहीं भी ऐसी व्यवस्था व सत्ता शायद ही दृष्टिगोचर हो यह हैरान व परेशान करने वाला विषय है जब भारत पर ईस्ट इंडियन कंपनी राज करती थी तो वह यहाँ के मूल निवासियों को परेशान व कुचलने के लिऐ मन मुताबिक क़ानून का निर्माण करती थी अब मुझे यह लिखना पड़ रहा है की स्व अटल बिहारी बाजपेई की कविता मे उल्लिखित यह पंक्तियां की *यह आजादी अधूरी है आज धरातल पर चरितार्थ हो रही है अब भी हम प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से ईस्ट इण्डिया कंपनी के राज मे ही जी रहे है*?

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